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कुंभ पर्व विशेष: जानिए कैसे होती है दशनामी साधुओं की साधना

Posted on: 03 Feb 2019 16:50 by Ravindra Singh Rana
कुंभ पर्व विशेष: जानिए कैसे होती है दशनामी साधुओं की साधना

भारत के चार कोनों में चार मठों की स्थापना के अलावा दशनामी संप्रदाय भी आदि शंकराचार्य से संबद्ध है। चार मठों में नियुक्त आचार्यों का पदनाम जगदगुरु शंकराचार्य होता है। स्वयं शंकराचार्य के नाम से संबोधित होने के कारण उसके आरंभ और प्रवर्तक का नाम अलग से बताने की जरूरत नहीं पड़ती। दशनामी संप्रदायों के साथ यह बात नहीं है। लेकिन संगठन, सामथ्र्य और प्रभाव की दृष्टि से दशनामी संप्रदाय या उसके अखाड़े शंकर मठों से कुछ ज्यादा ही प्रभावशाली हैं।

शंकर मठों के आचार्य पद प्रतिष्ठा की दृष्टि से भले ही ज्यादा चर्चित हों, लेकिन उनके अनुयायी अखाड़ों के साधु की बराबरी नहीं करते। सर जदुनाथ सरकार जैसे इतिहासकार का मानना है कि दशनामी संप्रदाय और उसके अखाड़ों की रचना सैनिक संगठन की तरह की। सात प्रमुख अखाड़ों के दावा, मढि और धूनि जैसी इकाइयों में विकेंद्रीकृत होते गए इन संगठनों में शस्त्राभ्यास भी किया जाता था। उद्देश्य धर्म संस्थानों पर होने वाले आक्रमणों का सशस्त्र प्रतिकार था।

अखाड़ों के बाद मढिय़ों का क्रम आता है और इनकी संख्या ५२ बताई जाती है। संप्रदाय का नाम दशनामी रखे जाने का कारण उनके लिए निर्धारित दस नाम हैं। तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती और पुरी नाम की उपाधियों का महत्व लौकिक से ज्यादा आध्यात्मिक है। इन नामों के जो अर्थ किए गए हैं, उनसे उपाधियों की गरिमा का आभास होता है। उदाहरण के लिए मठाश्रम में तीर्थ शब्द का अर्थ किया जाता है कि तत्वमसि आदि महावाक्यों का प्रतीक त्रिवेणी संगम है। उस तीर्थ में जो व्यक्ति तत्वार्थ जानने की इच्छा से स्नान करता है वह तीर्थ।

जिसके मन में आशा ममता मोहि आदि का नाश हो गया हो और जो आश्रम के नियम धारण करने में दृढ़वती हो उसका नाम आश्रम। एकांत वन प्रांतर में निवास करने वाले व्यक्ति का नाम ‘वन’ और वहीं रहते हुए नंदन वन का सा आनंद अनुभव करने वाला अरण्य पर्वत शिखर या गुहा में रहने और गीता आदि शास्त्रों के अध्ययन के तत्पर ‘गिरि’ पहाड़ों के मूल में निवास करने वाला पर्वत, समुद्र के पास रहने और आश्रम की मर्यादा का कभी उल्लंघन न करने वाला ‘सागर’ स्वर का ज्ञान रखने वाला ‘सरस्वती’ विद्या का भार धारण करने वाला ‘भारती’ और तत्व ज्ञान से पूर्ण संन्यासी पुरी है।

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