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जानिए क्या रहा है हमारे देश में कुंभ पर्व का इतिहास

Posted on: 14 Jan 2019 17:48 by Surbhi Bhawsar
जानिए क्या रहा है हमारे देश में कुंभ पर्व का इतिहास

सन् 1945ई. के सिंहस्थ कुंभ पर्व को न मनाए जाने का स्टेट द्वारा आदेश निकाला गया, किंतु साधु-संतों व उज्जैन की धार्मिक जनता ने इस आदेश को स्वीकार नहीं किया।

प्राचीन प्रमाणानुसार उज्जैन में वृश्चिक राशि में गुरु आने पर कुंभ मनाया जाता था। ईस्वी सन् 1930-31 में मालवा प्रांत पर मराठों का आधिपत्य हुआ तथा सिंधिया (शिंदे) राजवंश के संस्थापक, तत्कालीन राजधानी उज्जैन के महाराजा श्री राणोजी शिंदे की आज्ञा से सन् 1932 ईस्वी में उनके कर्मवीर दीवान बाबा श्रीराम चंद्रराव खुखटनकर ने वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ पर्व का आयोजन किया तथा उसके बाद से सिंहस्थ कुंभ पर शिंदेशाही की ओर से मेले का समस्त प्रबंध होता रहा।

ईस्वी सन् 1789 के बाद 1790 में सन् 1862 के बाद 1873 में व सन् 1969 के बाद 1980 में, 11 वर्षों के बाद 2122 में तथा सन् 2194 के बाद 2205 में 11 वर्षों के बाद ही सिंहस्थ मनाया जाएगा। बाकी समय 12 वर्ष के बाद सिंहस्थ होगा।

सन् 1838 ईस्वी (वि.सं. 1895) के सिंहस्थ पर्व पर वैष्णवों व संन्यासियों में भयंकर लड़ाई हुई, जिसमें दोनों तरफ से हजारों महात्मा मारे गए। वैष्णवों द्वारा लक्खीघाट स्थित नागाओं के मठ, जिसमें भगवान श्री दत्तात्रेयजी का स्वर्णमण्डित मंदिर था, को लूट लिया गया। प्रत्युत्तर में संन्यासियों द्वारा वैष्णवों के अखाड़े लूट लिए गए।

इसके बाद संन्यासियों द्वारा उज्जैन के कुंभ का त्याग कर दिया गया, वि.सं. 1963 में बड़वाई (इंदौर) में चातुर्मास कर रहे जूना अखाड़े के रमता पंच के श्रीमहंत रामगिरिजी 14 मढ़ी व अन्य श्री महंतों से महाराजा शिवाजीराव होल्कर ने उज्जैन कुंभ चालू करने की प्रार्थना की तथा अन्य अखाड़ों के श्रीमहंतों को व महाराजा माधवराव शिंदे आदि को बुलाकर निश्चय किया कि त्रयंब का कुंभ कर वैशाख पूर्णिमा सं. 1966 विक्रमी तद्नुसार दिनांक 5 मई सन् 1909 ईस्वी को सिंहस्थ कुंभ उज्जैन में मनाया जाएगा और इस प्रकार उज्जैन का कुंभ पुन: प्रारंभ हुआ।

सन् 1921 ई. (वि.सं. 1978 के सिंहस्थ के शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा दिनांक 21 मई शनिवार के दिन स्नान के समय ही महामारी का भयंकर प्रकोप हुआ, जिसमें हजारों लोग व साधु मृत्यु को प्राप्त हुए। शासन द्वारा तत्काल नगर खाली करने का ऐलान किया गया और लोगों को, जो भी साधन प्राप्त हुआ उससे बाहर भेजा गया।

सन् 1933 ईस्वी में दिनांक 9 मई (वैशाख पूर्णिमा, मंगलवार वि.सं. 1990) को शाही स्नान हुआ। सन् 1945 ईस्वी में दिनांक 27 मई रविवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2002) को, सन् 1957 ईस्वी में दिनांक 13 मई सोमवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2014) को, सन् 1969 ईस्वी दिनांक २ मई सोमवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2026) को, सन् 1980 ईस्वी में दिनांक 10 अपै्रल बुधवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2037) को एक ही शाही स्नान कुंभ पर्व का हुआ।

सन् 1732 ई. से सन् 1933 ई. तक के हर सिंहस्थ कुंभ पर सिंधिया राज्य (ग्वालियर स्टेट) की तरफ से परंपरा रही कि सिंहस्थ पर्व के 3-4 वर्ष पूर्व ही उज्जैन के ज्योतिषियों से सिंहस्थ पर्व के समय, सम्वत, तिथि आदि का निर्णय करवाकर प्रयाराज के कुंभ अवसर पर वहां एकत्रित अखाड़ों को विधिवत् आमंत्रित किया जाता था तथा पर्व की एक माह की अवधि में 15 दिन तक समस्त अखाड़ों, जमातों व साधु-संतों के भोजन की व्यवस्था राज्य की तरफ से की जाती थी तथा शेष दोनों की व्यवस्था उज्जैन की धार्मिक जनता करती थी। पर्व की समाप्ति पर राज्य की ओर से समस्त साधु-संतों को उनकी पद गरिमानुसार शॉल, भेंट आदि से सम्मानित किया जाता था। यह व्यवस्था सन् 1933 ई. के सिंहस्थ कुंभ तक बराबर चली। सन् 1945 ई. के सिंहस्थ कुंभ पर्व को न मनाए जाने का स्टेट द्वारा आदेश निकाला गया, किंतु साधु-संतों व उज्जैन की धार्मिक जनता ने इस आदेश को स्वीकार नहीं किया और सिंस्थ कुंभ मनाया गया। स्टेट की बजाए 15 दिन की व्यवस्था श्री दत्त अखाड़े गादीपति श्रीमहंत पीर श्री संध्यापुरीजी महाराज ने की तथा 15 दिन की उज्जैन के धार्मिक भक्तगणों द्वारा व्यवस्था की गई।

इसके पश्चात सन् 1956-57 ई. के सिंहस्थ कुंभ को लेकर श्री करपात्रीजी एवं दण्डी स्वामी तथा अखाड़ों के मध्य विवाद चला, किंतु षट्दर्शन अखाड़ों ने 1957 ई. में ही सिंहस्थ मनाया। इसी प्रकार सन् 1967-68 ई. के सिंहस्थ कुंभ को लेकर वैष्णव अखाड़ों व संन्यासी अखाड़ों में विवाद रहा, जिसके फलस्वरूप वैष्णव अखाड़ों ने 1968 में सिंहस्थ मनाया तथा अन्य सभी षट्दर्शन अखाड़ों (संन्यासी, उदासीन तथा निर्मल) ने सन् 1969 ई. में सिंहस्थ कुंभ मनाया।

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