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पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अनुभवों पर लिखी तीसरी किताब ‘द कोलिशन यीअर्स 

दिलीप गुप्ते

बेमेल मेल के साक्षी

पढ़े लिखे लोगों की आत्मकथा पढ़ना पढ़ाई करने जैसा है. उसमें आत्मस्तुति कम और सामाजिक चित्रण ज्यादा होता है. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अनुभवों पर लिखी तीसरी किताब ‘द कोलिशन यीअर्स : १९९६-२०१२’ अपने समय की राजनीतिक उथल पुथल का चित्र सामने रखती है. इसके पहले वे ‘दि इंदिरा गांधी यीअर्स : १९६९-१९८०’ और ‘द टरब्युलेंट यीअर्स :१९८०-१९९६’ लिख चुके हैं. तीसरी किताब उन्होंने भारतीय वोटरों को समर्पित की है.
पुस्तक का आरंभ उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के अंत से किया है. वे लिखते हैं कि उनके ३७ सालों के सांसद जीवन की यात्रा जुलाई को समाप्त हुई, जब वे भारत के राष्ट्रपति चुने गए. पाँच साल बाद २५ जुलाई २०१७ को उनका संसद से संबंध उनके देश के इस सर्वोच्च पद छोड़ने पर समाप्त हुआ. अब वे मात्र नागरिक हैं.
उनका राजनीतिक जीवन १९७१ के अंत में शुरू हुआ जब बांग्ला कॉंग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस में विलय हुआ. वे कॉंग्रेस संसदीय दल के सदस्य बने. जब वे राज्यसभा के सदस्य बने तो वहां उनका आज़ादी के सिपाहियों से परिचय हुआ. वे साम्यवादी नेता भूपेश गुप्त से प्रभावित थे. वे इंदिरा गांधी की वाक्पटुता से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने लिखा है कि १९७७ में लोकसभा चुनाव में कॉंग्रेस की हार के बाद जब वे लंदन गईं तो हवाई अड्डे पर पत्रकारों ने उनसे तीखा सवाल किया कि उन्हें आपातकाल ले क्या हासिल हुआ. इस पर उन्होंने बिना आपा खोए कहा कि इन २१ महीनों में हमने पूरी तरह से भारतीय जनता से खुद को दूर कर लिया. इसके बाद किसी ने सवाल नहीं किया. अपनी असफलता पर सफ़ाई देने की बजाय खुद की ग़लती मानना बेहतर होता है. १९६९ में कॉंग्रेस के दो टुकड़े हुए, १९७१ में इंदिरा कॉंग्रेस को भले ही भारी बहुमत मिला, लेकिन राज्यसभा में वह अल्पमत में आ गई. इस कारण कई बिल लोकसभा में पारित होने के बावजूद राज्यसभा में नकार दिये गए.
पूर्व राष्ट्रपति कहते हैं कि संसद गंगोत्री है. यदि यह दूषित हुई तो इसकी सहायक नदियाँ भी दूषित होंगी. वे संसद की प्रभावशाली कार्रवाई के लिये तीन ‘डी’ पर ज़ोर देते हैं. डिबेट यानी बहस, डिसेंट यानी असहमति और डिसीशन यानी निर्णय. वे आगे बताते हैं कि अब चौथा डी’ आ गया है. डिसरप्शन यानी विघटन.
संयुक्त मोर्चे की सरकार में कॉंग्रेस भी एक घटक थी. प्रधान मंत्री देवेगौडा बोफ़ोर्स मामले में कड़ा रूख अपनाए हुए थे. नाराज़ कॉंग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया. इसका कई सांसदों ने विरोध किया. वे जनता के सामने जाने से डरते थे. देवेगौडा के बाद इंद्र कुमार गुजराल प्रधान मंत्री बने. प्रणब दा गुजराल की तारीफ़ करते हुए उन्हें सुलझा हुआ और ईमानदार बताते हैं. गुजराल ने राजीव गांधी हत्या की जाँच करने वाले जैन आयोग को आगे बढ़ने से नहीं रोका. जाँच में गुजराल सरकार की सहयोगी डीएमके का हाथ होने की बात सामने आई. सहयोगी कॉंग्रेस ने डीएमके को मंत्री परिषद से निकालने पर ज़ोर दिया लेकिन गुजराल अडे रहे और सिर ऊँचा कर इस्तीफ़ा दे दिया. एक बार फिर चुनाव हुए और अटल बिहारी वाजपेयी की अल्पमत सरकार ने सत्ता सँभाली. तेरह दिनों बाद वह गिर गई. फ़रवरी १९९८ में बारहवाँ लोकसभा के लिये आमचुनाव हुए. यूँ तो भाजपा को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, पर अकेली बड़ी पार्टी होने के नाते राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने और समर्थन करने वाली पार्टियों की फ़हरिस्त माँगी. फिर भी संख्या २६४ से आगे नहीं बढ़ी . तेलुगु देशम पार्टी ने तटस्थ रहने का निर्णय लिया. वाजपेयी सरकार ने सत्ता सँभाली. पोखरण के तीन भूमिगत परमाणु विस्फोट की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी आलोचना हुई. यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने इसे बड़ा दुखद बताया. वाजपेयी की लाहौर मैत्री यात्रा के कुछ ही माह बाद कारगिल युद्ध शुरू हुआ. उधर तमिलनाडु से जयललिता ने लोकसभा में अपने १७ सांसदों का समर्थन वापस ले लिया. बजट सत्र के पहले ही सरकार का विश्वास प्रस्ताव एक वोट से पराजित हो गया. यह वोट कॉंग्रेस के गिरिधर गोमांग का था, जो ओड़िसा के मुख्यमंत्री थे, लेकिन उन्हें छह माह के अंदर विधानसभा का चुनाव जीतना था.उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र नहीं दिया था. वाजपेयी सरकार एक बार फिर गिर गई. लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कॉंग्रेस हलचल में आ गई. इसी समय सोनिया गांधी के विदेशी मूल की होने का विवाद भी खड़ा हुआ. शरद पवार को उम्मीद थी कि पार्टी सोनिया की जगह उनका नाम प्रस्तावित करेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं . उन्होंने राष्ट्रवादी कॉंग्रेस नाम से अलग दल बना लिया. यह बाद में सिर्फ महाराष्ट्र तक ही सीमित रह गया.
१९९९ के चुनावों में कॉंग्रेस की और भी फ़ज़ीहत हुई. सीताराम केसरी की अध्यक्षता में पार्टी ११४ तक सिमट गई. एनडीए को एक बार फिर मौक़ा मिला. पहली बार यह गठबंधन पाँच साल तक चला. वाजपेयी ने नरसिंह राव की आर्थिक नीतियाँ जारी रखीं. करगिल युद्ध, विमान अपहरण, अक्षरधाम कांड, कश्मीर विधानसभा पर बम विस्फोट और संसद पर आतंकी हमला भी इसी दौरान हुआ. संसद पर हमले के समय प्रणब दा अपने मिठाई प्रेम के कारण बच गए. यदि वे उस समय बाहर निकल रहे होते तो दुर्घटना के शिकार हो सकते थे.
प्रणब दा के मन में वाजपेयी के प्रति सम्मान था. वे उनके परमाणु विस्फोट पर लिये गये क़दम की तारीफ़ करते हैं. आर्थिक सुधारों के लिये वाजपेयी कहा करते थे कि सरकार इसके लिये अपनी ओर से कुछ नहीं कर रही, बस नरसिंह राव की नीतियों को आगे बढ़ा रहे हैं.
२००३ के विधान सभा चुनावों में भाजपा ने हिंदी प्रदेशों मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विजय पाई. लेकिन दिल्ली में कॉंग्रेस से हार गई. भाजपा ने इन सफलताओं को देश की पसंद समझ लिया और छह माह पहले अप्रैल २००४ में ही लोकसभा के चुनाव करवाए. कॉंग्रेस ने अपनी पचमढी बैठक में तय किया था कि ज़रूरत पड़ने पर वह दूसरे दलों के साथ सरकार बना सकती है. प्रणब दा इसके ख़िलाफ़ थे. चुनाव की घोषणा के बाद प्रणव दा ने पहली बार राज्यसभा सदस्य रहते लोकसभा का चुनाव लड़ा. तब तक उनके पास कई मंत्रालयों का अनुभव था. चुनाव हुए और इंडिया टुडे-ओआरजी- मार्ग के ओपीनियन को झुठलाते हुए कॉंग्रेस का बहुमत दिया. इस पर वाजपेयी ने कहा कि वे वोटर का मूड नहीं समझ सके. सत्ता में वापसी के बाद कॉंग्रेस चाहती थी कि सोनिया गांधी प्रधान मंत्री बनें. काफ़ी जद्दोजहद के बाद मनमोहन सिंह के नाम पर सहमति बनी. इस पर लोगों ने क़यास लगाना शुरू किया कि क्या प्रणब दा अपने जूनियर रहे सिंह के मातहत बनने को राज़ी होंगे. लेकिन सोनिया गांधी के दबाव डालने पर प्रणब दा मान गए. सिंह महत्वपूर्ण मामलों में प्रणव की सलाह लेंगे. समान विचारधारा वाले दलों से भी मंत्री पद के बारे में चर्चा की गई. तेलंगाना राष्ट्र समिति वाले के चंद्रशेखर राव ने शर्त रखी कि तेलंगाना अलग से राज्य बनाया जाए. शरद पवार ने कृषि मंत्रालय के अलावा और मंत्रालय माँगे. डीएमके ने भी शर्तें रखीं जो मान ली गईं. वित्त मंत्रालय के लिये सोनिया गांधी की पसंद प्रणब दा ही थे लेकिन उन्होंने सिंह से सैद्धांतिक मतभेद होने के कारण इनकार कर दिया और बदले में गृह मंत्रालय माँगा. लेकिन मिला रक्षा मंत्रालय. वे मंत्रिमंडल में दूसरे स्थान पर थे. स्पीकर के पद पर मार्क्सवादी सोमनाथ चटर्जी को लाया गया. मनमोहन सिंह के बारे में प्रणब दा कहते हैं कि वे ‘ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ नहीं थे. वे कहते हैं कि भविष्य अलग ही रूप में सिंह का मूल्याँकन करेगा. उन्हें ‘सुधारों का जनक’ कहा जाएगा. अमेरिका के साथ परमाणु संधि को प्रणब दा सबसे महत्वपूर्ण घटना मानते हैं. इस पर संसद ने बहुत तनावपूर्ण समय झेला.
करगिल युद्ध बहुत पुराना नहीं था. सेना को आधुनिक हथियारों से लैस करना था. सेना संबंधी कई स्कैंडल हवा में तैर रहे थे. उनसे निबटना था. फ़ंड की कमी थी ही. २००६ में उन्हें विदेश मंत्रालय सौंपा गया. उनके कार्यकाल में पुरानी संधि को नया स्वरूप दिया गया. नेपाल , बांग्ला देश और श्रीलंका के साथ तनावपूर्ण संबंधों पर चर्चा कर नया रास्ता खोजा गया. ऐसा नहीं था कि सब ठीक चल रहा था. असंतोष उभर रहा था. २६/११ के हमले के बाद गृहमंत्री शिवराज पाटील की आलोचना हो रही थी. उन्हें हटा कर प्रणब दा को गृह मंत्रालय संभालने को कहा गया. सेना मामलों में जाँच के चलते प्रणब दा के इंकार करने के बाद पी चिदांबरम को गृह मंत्रालय सौंपा गया. परमाणु संधि पर वाम दल सरकार के विरुद्ध थे. सरकार ने विश्वास प्रस्ताव रखा. एक बार ऐसा लगा कि सरकार गिर जाएगी. लेकिन वह बच गई.
जनवरी २००९ में प्रधान मंत्री सिंह की बायपास सर्जरी के दौरान प्रणब दा को वित्त मंत्रालय की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी दी गई. उन्होंने प्रधान मंत्री की जगह राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के साथ कज़ाकिस्तान के राष्ट्रपति के स्वागत की औपचारिकता निभाने की ज़िम्मेदारी भी निभाई.
संप्रग ने २००९ के लोकसभा चुनाव में फिर बहुमत हासिल किया. प्रणब दा एक बार फिर वित्त मंत्री बने. जीएसटी और आधार कार्ड पर सरकार को भाजपा का विरोध सहना पड़ा.
प्रतिभा पाटील का राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त हुआ और यूपीए ने प्रणब मुखर्जी को बतौर उम्मीदवार घोषित किया. राष्ट्रवादी कॉंग्रेस के पीएँ संगमा को उनके ही राज्य में मात खानी पड़ी. प्रणब मुखर्जी भारी मतों से जीते

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