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सिंधिया जी, अब भाजपा लिखने में शर्म कैसी….

वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आ चुके हैं। इसलिए उनके ट्वीटर हैंडल को लेकर खड़ा हुआ विवाद बेवजह नहीं कहा जा सकता, जैसा दिखाने की कोशिश सिंधिया की ओर से की जा रही है। ज्योतिरादित्य कांग्रेस में थे। न उनकी नेतृत्व सुन रहा था, न प्रदेश की सरकार उन्हें तवज्जो दे रही थी। प्रदेश के नेता उन्हें किनारे करने में सफल होते दिख रहे थे। इन कारणों से उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का मन बनाया। इसके संकेत उन्होंने अपने ट्वीटर एकाउंट से कांग्रेस हटा कर दिए। यहां तक बात समझ में आती है। वे बाद में कांग्रेस से अलग भी हो गए। इसके बाद वे भाजपा में आए। खुद नरेंद्र मोदी, अमित शाह तथा जेपी नड्डा ने उनका पार्टी में स्वागत किया। इसके बाद उनका अपने ट्वीटर हैंडल में भाजपा न लिखना सवाल खड़े करता है। इसलिए भी क्योंकि अब तक न वे राज्यसभा पहुंचे, न केंद्रीय मंत्री बने और न ही उनके समर्थक डील के अनुसार प्रदेश मंत्रिमंडल में शामिल हो सके। राजनीति में इसकी वजह से कई तरह की आशंकाओं का जन्म स्वाभाविक है। ऐसे हालात में यह सवाल उठना स्वाभाविक है और इसका तर्कसंगत जवाब उन्हें देना चाहिए कि जब वे भाजपा ज्वाइन कर चुके हैं तो सोशल मीडिया में अपने नाम के साथ भाजपा लिखने में शर्म कैसी?

क्या नरोत्तम वास्तव में सुपर सीएम….

सुख-दुख के अवसरों को छोड़ दें तो मुख्यमंत्री किसी मंत्री के घर सिर्फ चाय-नाश्ता करने जाये, आमतौर पर ऐसा देखने-सुनने को नहीं मिलता। शिवराज सिंह चौहान 13 साल तक लगातार मुख्यमंत्री रहे, बिना कारण वे किसी मंत्री के घर गए हों, यह याद नहीं आता। इसीलिए शिवराज जब अचानक मंत्री नरोत्तम मिश्रा के घर पहुंचे और कहा कि इनके यहां काफी दिन से नाश्ता ड्यू था, इसलिए आ गया। यह बात किसी के गले नहीं उतरी। शिवराज के नरोत्तम के घर जाने का असल कारण अब तक सामने नहीं आया। इसलिए कयासों का दौर जारी है। कोई कह रहा है कि सीएम, सुपर सीएम से मिलने उनके घर गए। कोई इस मुलाकात को मंत्रिमंडल विस्तार से जोड़ रहा है तो कोई राज्यसभा चुनाव से। कुछ राजनीतिक भविष्यवक्ता इससे भी आगे बढ़ गए। नरोत्तम को भविष्य का मुख्यमंत्री बता दिया गया। इसका अहसास शिवराज को है, इसकी वजह से वे नरोत्तम के घर पहुंचे। बहरहाल इसके मायने तलाशे जा रहे हैं। कारण कुछ भी हो लेकिन इससे साबित हुआ कि नरोत्तम किसी से कम ताकतवर नहीं है। इसीलिए शिवराज ने उन्हें उनके विभागों में काम के लिए फ्री हैंड दे रखा है।

बगावत की आशंका से डर गई भाजपा….

भाजपा कैडर आधारित दल है और इसका मातृ संगठन आरएसएस। यह दल अंदरूनी बगावत से डर गया, यह खबर अचंभित करने वाली है, किसी के गले उतरने वाली भी नहीं। भाजपा को लेकर यह खबर सरगर्म है कि पार्टी नेतृत्व को मंत्रिमंडल विस्तार होने पर बगावत की आंशका है। इसलिए इसे राज्यसभा चुनाव तक के लिए टाला जा सकता है। सपा, बसपा तथा निर्दलीयों के साथ यदि पार्टी के कुछ विधायक भी क्रास वोटिंग कर बैठे तो राज्यसभा की दूसरी सीट खतरे में पड़ सकती है। यह खतरा बेवजह भी नहीं है। भाजपा ने राज्यसभा का उम्मीदवार कांग्रेस से आए वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को बनाया है। सिंधिया के साथ कांग्रेस के 22 पूर्व विधायक भी पार्टी में आए हैं। इनकी वजह से भाजपा के कई दिग्गजों का मंत्री पद खतरे में है। मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर ये दिग्गज क्रास वोटिंग कर अपनी खुन्नस निकाल सकते हैं। इस खतरे की सूचना से भोपाल से दिल्ली तक पार्टी नेतृत्व सकते में है और मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर कोई निर्णय नहीं ले पा रहा है। इस आशंका के चलते विस्तार राज्यसभा चुनाव के बाद किया जा सकता है। भाजपा में यह कांग्रेस जैसी बीमारी के लक्षण हैं।

खतरे में बिसेन-शाह जैसे दिग्गजों का मंत्री पद….

भाजपा के कद्दावर नेता व पूर्व नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव को जब भी किनारे करने की कोशिश होती है, अचानक कुछ ऐसा होता है कि वे फिर ताकतवर होकर उभर आते हैं। भाजपा सत्ता से बाहर हुई। नेता प्रतिपक्ष के लिए शिवराज सिंह चौहान, भूपेंद्र सिंह एवं नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गज दावेदार थे। भार्गव ने अचानक बाजी पलट कर सबको हैरत में डाल दिया। कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर फिर भाजपा की सरकार बनी। मुख्यमंत्री पद के लिए नेता प्रतिपक्ष के नाते भार्गव का स्वाभाविक दावा था, लेकिन मौका फिर शिवराज सिंह चौहान को मिला। पांच सदस्यीय छोटा मंत्रिमंडल बना, उसमें भी भार्गव को जगह नहीं मिली। चर्चा चल पड़ी कि राजनीति में भार्गव के दिन अब लद गए। अचानक गौरीशंकर बिसेन एवं विजय शाह जैसे दिग्गज उनके घर पहुंच गए। बिसेन एवं शाह का मंत्री पद इस बार खतरे में है। भार्गव दोनों को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास गए। मैसेज गया कि भार्गव अभी चुके नहीं। उनका मंत्रिमंडल में स्थान पक्का है। वे बिसेन एवं शाह जैसे नेताओं की सिफारिश का भी माद्दा रखते हैं। हालांकि एक चर्चा यह भी है कि भार्गव, बिसेन एवं शाह ने सरकार पर दबाव बनाने की रण्नीति के तहत बैठक की।

भूपेंद्र जैसा भरोसा किसी अन्य नेता पर नहीं….

पुरानी कहावत है, ‘दुश्मनी इतनी करो, जब दोस्ती करने का मौका आए तो शमिंर्दा न होना पड़े’। ताजा राजनीतिक हालात में यह कहावत चरितार्थ होने लगी है। सागर के दो नेताओं गोविंद सिंह राजपूत एवं भूपेंद्र सिंह को ही लें। सुरखी विधानसभा सीट के चुनाव में ये दो बार आमने-सामने थे। दोनों ने एक-एक बार जीत दर्ज की और एक-एक बार हार। अब दोनों एक ही दल भाजपा में हैं। सुरखी के लिए उप चुनाव होना है। भाजपा के टिकट पर गोविंद का मैदान में उतरना तय है और उन्हें जिताने की जवाबदारी भूपेंद्र को सौंपी गई है। भाजपा कार्यालय में दोनों ने एक-दूसरे की जिस तरह तारीफ की, कोई कह नहीं सकता था कि ये कभी प्रबल विरोधी भी रहे होंगे। खास बात यह है कि भूपेंद्र जैसा भरोसा भाजपा के अन्य नेताओं पर नहीं किया गया। जैसे, मुरैना, हाटपिपल्या, ग्वालियर में पार्टी ने भूपेंद्र की तरह रुस्तम सिंह, दीपक जोशी एवं जयभान सिंह पवैया को जवाबदारी नहीं सौंपी। इतना ही नहीं बागियों की वजह से 22 सीटों पर उप चुनाव होना है लेकिन सुरखी के अलावा किसी अन्य सीट से प्रतिद्वंद्वी को प्रभारी का दायित्व नहीं दिया गया। साफ है, इस मामले में भी पार्टी नेतृत्व के भरोसे में भूपेंद्र ही खरे उतरे।

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