मध्य प्रदेश

नि:शांत भाव से कम करता एक शख्स

राजेश राठौर

कोरोना वायरस के डर के बीच घर से निकलकर फील्ड में जाना विरान सड़कों पर फिर मन में भय होना और उसके बाद किसी अस्पताल किसी बस्ती या कलेक्ट्रेट कार्यालय या रेसीडेंसी कोठी तक पहुंचना एक अलग ही अनुभव रहा। आशा कार्यकर्ताओं को तपती दोपहर में हर घर तक जाते हुए देखना, अफसरों की गाड़ियां दौड़ती हुई और उसमें तेजी से उतर कर काम पर लगना। इस तरह के तमाम दृश्य देखकर कई बार मन व्यथित हो जाता था। फिर खुद को संभालते हुए अफसरों से डॉक्टरों से और पुलिस वालों से बात करके अपने आप को हल्का करने की कोशिश भी करना आसान काम नहीं था।

इन सब तकलीफ के बीच लगातार एक शख्स मुझ दिखता रहा। दुबला पतला शांत स्वभाव से काम करते हुए देखने वाला वह व्यक्ति बार-बार आंखों में खटक रहा था। लग रहा था कि कौन है अपने आप से सवाल करने के साथ-साथ मैंने कई दिनों पहले अप्रैल में ही पता कर लिया था कि यह शख्स कौन है। वह शख्स जिस शांत स्वभाव के साथ सब को शांत करते हुए काम कर रहा था, उस शख्स का नाम भी निशांत है। निशांत के बारे में मैंने अफसरों से पूछा फिर पत्रकार होने के कारण मुझसे रहा नहीं गया और मैंने सीधे उनसे मुलाकात की। मुलाकात में लगा कि यह शख्स बिना लाग लपेट के बात करता है। निस्वार्थ भाव से काम कर रहा है। समाज के लिए कुछ करने की दिशा में बरसों से लगा है। इसी कारण इस शख्स को राज्य सरकार ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए जो कमेटी बनाई है उसमें इंदौर संभाग से एकमात्र डॉक्टर निशांत खरे को लिया है।

सामान्य दिनों में यह व्यक्ति सर्जन है, प्लास्टिक सर्जरी करते हैं। प्राइवेट डॉक्टर है। प्राइवेट अस्पतालों में जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े हैं। वहां ये विभाग के संपर्क प्रमुख हैं जिनका काम ही होता है समाज के सभी लोगों से लगातार मिलते रहना, उनको संघ और समाज के बारे में बताते रहना। रेसीडेंसी कोठी में यह शख्स दौड़ते भागते लेकिन शांत स्वभाव से काम करता हुआ दिखाई देता है। कभी मेडिकल कॉलेज की टीम से, कभी बड़े अस्पताल के डॉक्टरों से, कभी पुलिस अफसरों से तो कभी कलेक्टर, कमिश्नर से बात करते हुए दिखते हैं। अधिकांश मीटिंग का मुख्य हिस्सा रहते हैं और कैलाश विजयवर्गीय हो या शंकर लालवानी या कोई भी विधायक, भले ही वह कांग्रेस का हो या भाजपा का सबसे निशांत खरे बात करते हुए दिखते हैं। इतना धीरे बोलते हैं कि पास में खड़े व्यक्ति को भी आवाज सुनाई नहीं देती।

जब मैंने उनसे पूछा कि आप कौन हैं, तो उन्होंने कहा मैं डॉक्टर निशांत खरे हूं। मैंने उनसे पूछा आप क्या कर रहे हैं?, तो कहा कि मुझे राज्य सरकार ने कमेटी में लिया है, इसलिए मैं समन्वय का काम कर रहा हूं। डॉक्टर होने के नाते मुझे समझ है कि मैं अपनी क्या भूमिका निभा सकता हूं। डॉक्टर खरे कहते हैं मैं समाज के सब लोगों से अपने स्तर पर मिलता रहता हूं। फिर अफसरों और डॉक्टरों से बात करता हूं और उनको बताता हूं कि हमें क्या करना चाहिए। मैं अकेला कोई सलाहकार नहीं हूं। बहुत सारे लोग सलाह देते हैं। उसके आधार पर फैसले होते हैं। इंदौर में तेजी से बढ़े कोरोना वायरस के मरीजों के सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं कि बहुत कम फैला है। जो हालात थे, वह किसी को पता नहीं है। अप्रैल में कैसे हमने काम किया है, बहुत कम लोगों को यह बात पता है।

कितना मुश्किल था आशा कार्यकर्ताओं को घर-घर पहुंचाना। रानीपुरा व टाटपट्टी बाखल जैसी घटना होने के बाद डॉक्टरों की टीम को सक्रिय रखना, कैसे अफसरों का हौसला बढ़ाना, समाजसेवी संस्थाओं से कैसे भोजन बनवाना, राशन गरीबों के घर तक पहुंचाना कोई एक काम नहीं था। जो-जो काम आता गया उसे तत्काल सबने मिलकर करना शुरू किया। जब कोई काम तत्काल शुरू किया जाता है, तो उसमें कुछ गलतियां भी हो जाती है। इसका मतलब यह नहीं कि अच्छा कुछ नहीं किया। बहुत कुछ अच्छा किया। इसी कारण शहर की स्थिति जो भयावह होना थी वह नहीं हुई।

कोरोना वायरस के मरीज पॉजिटिव होने के बावजूद घूमते रहे और लोगों को संक्रमित करते रहे। लॉकडाउन का पालन सख्ती से कराया गया। मैंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा कि सबके बीच कम्युनिकेशन गैप ना हो। समन्वय ऐसा हो ताकि हम इस महामारी से पूरी तरह से बाहर भले ही ना निकल पाए, लेकिन स्थिति कंट्रोल में हो। खरे से जब पूछा आपके अनुभव क्या है तो कहने लगे बहुत लंबी कहानी है, लेकिन कुछ बता देता हूं। इंदौर में समाजसेवी लोगों ने काफी मदद की, दानदाताओं ने आगे बढ़कर मदद की, जो प्रशासनिक अफसर और सरकारी डॉक्टरों के बारे में आम धारणा थी उससे हटकर इन्होंने दिल से काम किया। अभी जो काम हो रहा है उसमें कैसे बेहतर हो इसको लेकर सब बात आपस में लगातार करते हैं।

फिर इंदौर में निजी अस्पतालों को ग्रीन, येलो और रेड केटेगरी में बांटा तो वह काम भी आसान नहीं था। किसी एक व्यक्ति ने मेहनत नहीं की सब ने मेहनत की। जब इंदौर के लोगों को पता चला कि मजदूर बायपास से पैदल जा रहे हैं भूखे प्यासे हैं तो शहर के तमाम लोग वहां पर सेवा में जुट गए। इंदौर ने अपने आपको करेक्ट लगातार किया। लोगों की थोड़ी मदद और मिल जाए, हम इतने दिन तक घरों में रहे अब कुछ दिन और हम अपने आप को संभाल ले। शहर के हालात बहुत तेजी से सुधर जाएंगे। जब जो परिस्थिति बनी उसके हिसाब से फैसले लिए गए। सुबह से लेकर रात तक सब से बात करता हूं और किस जगह कहां ओर हम बेहतर कर सकते हैं उसके लिए अफसरों, डॉक्टरों और समाज से बात करता रहता हूं।

अभी हालात बिगड़ सकते हैं यदि हमने नियमों का पालन नहीं किया। विश्व स्वास्थ संगठन की चेतावनी को नजरअंदाज नहीं कर सकते। विशेषज्ञों की सलाह को भी हम झुठला नहीं सकते। आने वाला समय और कठिन है, इसलिए सबको मिलकर पूरी ताकत के साथ काम करना पड़ेगा और सबसे बड़ी बात यह है कि शारीरिक दूरी, मास्क पहनना और सैनिटाइजर का उपयोग करना बहुत जरूरी है। अपने बारे में कुछ नहीं कहना चाहता सिर्फ एक जवाबदारी है उसको पूरी ईमानदारी के साथ आखिरी समय तक निभाऊंगा। जब तक हम कोरोना वायरस से मुक्त नहीं हो जाते।