दिल्ली हाईकोर्ट में सरकार की दलील, निजी स्कूलों की मनमानी फीस पर लगे रोक, अभिभावकों को राहत देना अनिवार्य

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By Raj RathorePublished On: February 21, 2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने निजी स्कूलों की फीस वसूली से जुड़े विवाद में शुक्रवार को अहम सुनवाई की। मुख्य मुद्दा यह रहा कि नए शैक्षणिक सत्र से पहले स्कूल किस प्रक्रिया से फीस तय करेंगे और क्या स्वीकृति के बिना अतिरिक्त फीस ली जा सकती है। कोर्ट के सामने सरकार ने साफ कहा कि निजी स्कूल केवल वही फीस ले सकेंगे जो नियमों के तहत स्वीकृत होगी।

सरकार का पक्ष था कि 1 अप्रैल से शुरू होने वाले सत्र के लिए बिना नियामकीय मंजूरी फीस वसूली की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत को बताया गया कि अगर कोई स्कूल स्वीकृत शुल्क से अलग फीस लेता है, तो इसे कानून का उल्लंघन माना जाएगा और उस पर कार्रवाई संभव है।

यह विवाद ऐसे समय में आया है जब निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वसूली की शिकायतें लगातार उठती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने अदालत में कहा कि नई फीस विनियमन व्यवस्था का उद्देश्य अभिभावकों को राहत देना और शुल्क निर्धारण को पारदर्शी बनाना है।

सरकार का पक्ष: समितियों पर रोक से गंभीर असर

सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि स्कूल स्तर की फीस नियमन समितियों के गठन पर रोक लगाने से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उनके मुताबिक, इन समितियों के बनने से स्कूलों को नुकसान नहीं होगा, बल्कि नए सत्र से पहले शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया व्यवस्थित तरीके से पूरी हो सकेगी।

“स्कूल स्तर की फीस नियमन समितियों के गठन पर रोक लगाई गई तो गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।” — एसवी राजू, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल

सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि दिल्ली स्कूल शिक्षा कानून के तहत स्कूल केवल स्वीकृत फीस ही ले सकते हैं। उसके अनुसार, स्वीकृत ढांचे से बाहर कोई अतिरिक्त शुल्क लेना वैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।

सरकारी पक्ष ने कहा कि यदि 1 अप्रैल 2026 से पहले फीस निर्धारण नहीं होता और मनमानी जारी रहती है, तो कानून का उद्देश्य प्रभावित होगा। अदालत में यह भी कहा गया कि मौजूदा प्रावधान शिक्षा के व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी पर रोक के लिए बनाए गए हैं।

शिक्षा निदेशालय का रुख

दिल्ली शिक्षा निदेशालय की ओर से कहा गया कि अगर 2026-27 सत्र से यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू नहीं हुई, तो अभिभावकों को राहत देने का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। निदेशालय ने शुल्क नियंत्रण को नए सत्र की शुरुआत से लागू रखने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे।

निजी स्कूल संघ की आपत्ति

मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ निजी स्कूल संघ की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। याचिकाओं में उस सरकारी अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें स्कूलों को 10 दिनों के भीतर स्कूल-स्तरीय फीस नियमन समिति गठित करने का निर्देश दिया गया था।

निजी स्कूलों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल पेश हुए। उनका तर्क था कि अधिसूचना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है, क्योंकि यह अधिनियम में तय समय-सीमा से अलग व्यवस्था लागू करती है। उन्होंने कहा कि कानून के मुताबिक फीस तय करने की प्रक्रिया पिछले शैक्षणिक वर्ष के जुलाई से शुरू होनी थी, ऐसे में बहुत कम समय में पूरी प्रक्रिया कराना व्यावहारिक नहीं है।

“कानून के मुताबिक शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया जुलाई से शुरू होनी थी, अब इतने कम समय में यह व्यावहारिक नहीं है।” — अखिल सिब्बल, वरिष्ठ अधिवक्ता

अगली तारीख और अंतरिम स्थिति

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी को तय की। साथ ही, स्कूलों को समिति गठन के लिए दी गई समय-सीमा बढ़ा दी गई है।

सरकारी अधिसूचना पर रोक लगाने की मांग पर अदालत ने तत्काल फैसला नहीं दिया। इस पहलू पर अगली सुनवाई में आदेश आने की संभावना है। फिलहाल, मामला इस संतुलन पर टिका है कि एक ओर अभिभावकों को मनमानी फीस से राहत मिले और दूसरी ओर स्कूलों को प्रक्रिया पूरी करने के लिए व्यवहारिक समय भी उपलब्ध रहे।