अमेरिकन ऑर्गेनाइजेशन ने माना मध्यप्रदेश में हुआ गंभीर मानवाधिकार हनन

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भोपाल: अमेरिका में स्थापित यूनीवर्सिटी नेटवर्क फॉर ह्यूमन राइट्स “यूनीवर्सिटी नेटवर्क” ने अपने रिपोर्ट वेटिंग फॉर दी फ्लड: में माना है कि सरकार ने आदिवासियों के मानवाधिकार मामलें में गंभीर लापरवाही करते हुए कानूनों का उल्लंघन किया है। संस्था ने सरदार सरोवर बांध से प्रभावित नर्मदा के किनारे रहने वाले आदिवासी समुदायों पर मानव अधिकार प्रभाव पर आधारित डॉक्यूमेंट रिलीज़ किया है।

यह रिपोर्ट सरदार सरोवर बांध के मानवीय परिणामों और भारत सरकार की विस्थापित एवं जल्द ही विस्थापित होने वाली परिवारों की परामर्श न लेने एवं उन्हें पर्याप्त रूप से मुआवजा देकर पुनर्वास करने की असफलता को डॉक्यूमेंट करता है। यह रिपोर्ट प्रभावित क्षेत्रों में कई हफ़्तों की यात्राओं और बांध के पानी से डूबने के खतरे के तहत में रहने वाले आदिवासी समुदायों के साथ इंटरव्यूों पर आधारित है।

यूनीवर्सिटी नेटवर्क के एक्सेक्यूटिव डिरेक्टर रूहान नागरा ने कहा “सरदार सरोवर जलाशय में हाल ही में हुई जल स्तर की तेज वृद्धि एवं भारत सरकार के जलाशय को अधिकतम स्तर तक भरने की ज़िद के कारण हम बेहद चिंतित हैं, क्यों कि कई हज़ारों परियोजना-प्रभावित परिवारों को अभी तक पुनर्वासित नहीं किया गया हैं।” यूनीवर्सिटी नेटवर्क की सिफारिश है की भारत सरकार सरदार सरोवर बांध के गेट खोलें और जल स्तर को 122-मीटर तक घटाए ताकि भारतीय सरकार अपने संवैधानिक एवं अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों को निभाकर 138-मीटर जलमग्न चिह्न के अंतरगत रहने वाले सारे बांध परियोजना प्रभावित परिवारों को पहचाने और उनकी शर्तों का लिहाज़ करते हुए उन्हें पर्याप्त मुआवज़ा दे और उनका  पुनर्वास करें।

वेटिंग फॉर दी फ्लड (बाढ़ के इंतजार में) नामक यह रिपोर्ट बांध-प्रभावित आदिवासियों पर भारत सरकार एवं बांध अधिकारियों द्वारा किए गए अत्याचारों के चार पैटर्न  डॉक्यूमेंट करता है। इस रिपोर्ट में डॉक्यूमेंट किया गया प्रत्येक अत्याचार यह दर्शाता हैं कि भारतीय कानूनी शासन एवं अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून को अनदेखा करके भारत सरकार ने आदिवासी समुदायों के प्रति अपने दायित्वों का गंभीर उल्लंघन किया है।

साल 2017 की गर्मियों में सरकार और बांध अधिकारियों ने बांध के जलमग्न क्षेत्र में कई आदिवासी परिवारों को अपने घरों को ध्वस्त करने के लिए मुआवजे के अधूरे वादों, धमकियों, और उत्पीड़न का इस्तेमाल किया। परंतु इन में से कई परिवारों को अपने नए घर के निर्माण के लिए भूमि नही मिली हैं, जिसके कारण यह परिवार जलमग्न क्षेत्र छोड़ने में असमर्थ रहे हैं और वे अपने पूर्व घरों के खंडहर के पास अस्थायी घरों में आश्रय लेने के लिए विवश हो गए हैं। “जबरन बेदखली पर्याप्त आवास जैसे  मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन है। यह तो अकल्पनीय है कि घर के निवासियों को अपने घरों को स्वयं ध्वस्त करने की आवश्यकता थी,” यूनाइटेड नेशंस के आवास-अधिकार के स्पेशल रप्पोर्तेउर लेइलानी फरहा ने यह बात कही।

यूनाइटेड नेशंस के इंडिजेनस पीपल के अधिकारों की घोषणा के तहत भारत के दायित्वों का उल्लंघन करते हुए, सरकार और बांध अधिकारी बांध के जलमग्न क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के पारंपरिक भूमि अधिकारों को पहचानने में व्यवस्थित रूप से असफल रहे हैं। इस वजह से जिन परिवारों के पास अपने पैतृक कृषि भूमि के लिए औपचारिक शीर्षक नहीं हैं, उन्हें अपने इस डूबने-वाली भूमि के लिए मुआवजे की मांग करने का कोई आधिकारिक रास्ता नहीं है। सरकार और बांध अधिकारियों ने मनमाने ढंग से, या गलती से, सरकार के आधिकारिक “परियोजना प्रभावित व्यक्ति” सूची में कई आदिवासी परिवारों का नाम छोड़ दिया हैं – उनके पास अपनी (डूबी हुई या जल्द में डूबने वाली) ज़मीन के लिए पट्टा होने के बावजूद। इसके कारण इन व्यक्तियों को अपनी भूमि एवं आजीविका के नुकसान के लिए मुआवज़ा भी नहीं मिल सकता हैं।

जमीन के लिए भूमि मुआवजे के बजाय सरकार ने मुआवजे के लिए पैसे देने का निश्चय लेकर कई आदिवासियों को अकेले भूमि खरीदने के लिए विवश कर दिया हैं, जिसके कारण विस्तारित परिवारों एवं कई पीढ़ियों से साथ रहने वाले समुदाय अलग हो गए हैं।  फरहा ने कहा, “भारत को किसी भी पुनर्वास योजना को शुरू करने से पहले आदिवासी समुदायों को स्वस्थाने में ही रखने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। फरहा ने कहा कि पुनर्वास और पुनर्स्थापना केवल उन मामलों में ही हो सकता है जहां समुदायों को खतरनाक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा हैं और इन कठिनाइयों को कम नहीं किया जा सकता हैं।”

आदिवासी समुदायों की पैतृक भूमि पर सरदार सरोवर बांध के प्रभावों के बारे में किसी भी निर्णय में आदिवासी समुदायों को भागीदार बनाना चाहिए। जैसे की अगर पुनर्वास ज़रूरी हो, तो उन्हें पुनर्वास के समय और स्थल के निर्णय में भागेदार बनाना चाहिए,” इस बात पर फरहा ने  जोर दिया।

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