पद से हटते ही आखिर पूर्व मुख्यमंत्रियों को वैराग्य क्यों हो जाता है | Only after the departure of the post, why the chief ministers become quiet

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digvijay singh and shivraj singh chouhan-min

क्या मध्य प्रदेश की माटी में ही कुछ ऐसा है कि यहां पर मुख्यमंत्री(CM) जैसे ही पद से हटते हैं, तो उन्हें तुरंत वैराग्य हो जाता है और वे चुनावी राजनीति से अपने आप को दूर कर लेते हैं। मध्य प्रदेश के कांग्रेस राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ था जब वे मध्य प्रदेश में चुनाव हारे और कांग्रेस को यहां पर शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा तो दिग्विजय सिंह ने चुनावी राजनीति से अपने आप को दूर करते हुए यह कहा कि अब 10 साल तक मध्य प्रदेश में कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे।

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आखिर दिग्विजय सिंह ने ऐसा क्यों कहा इसके पीछे एक वजह यह बताई जाती है कि उन्होंने पार्टी हाईकमान से यह कहा था कि अगर इस बार कांग्रेस नहीं जीत पाई तो वे प्रदेश की राजनीति से अपने आप को हटा लेंगे। अब सवाल यह उठता है कि उन्होंने प्रदेश की राजनीति से अपने आप को हटाकर किसका भला किया क्योंकि जो जमीनी पकड़ दिग्विजय सिंह के पास थी वह कोई अन्य नेता नहीं बना पाया और दिग्विजय सिंह थे कि दिल्ली जाकर बैठ गए। अभी फिर से सक्रिय हो रहे हैं तो कांग्रेस में भी जान आ रही है क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि चुनाव हारने के बाद दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश की राजनीति में ही सक्रिय रहते और कार्यकर्ताओं को संगठित करते तो संभव है कि कांग्रेस को 15 साल का बनवास नहीं झेलना पड़ता।

इधर भारतीय जनता पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी यह कह दिया है कि मेरा मन नहीं है कि लोकसभा चुनाव लड़े आखिर चुनाव लड़ने से शिवराज सिंह जैसे जुझारू नेता को ऐतराज़ क्यों हो सकता है। उन्होंने कहा है की पार्टी कहेगी तो भोपाल क्या राधौगढ़ से भी लड़ जाऊंगा लेकिन फिलहाल उनका मन नहीं है उन्होंने अपनी पत्नी के मामले में भी कह दिया उनकी पत्नी भी चुनाव नहीं लड़ेगी।

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यहां यह भी सवाल उठता है कि शिवराज सिंह ने ऐसा क्यों कह दिया कि लोकसभा चुनाव(Lok sabha election) लड़ने का उनका मन नहीं है। क्या पार्टी उनके मन से चलेगी और आखिर क्या वजह है कि चुनाव हारते ही उन्हें भी वैराग्य हो गया चुनाव की राजनीति से जैसा कि दिग्विजय सिंह को हुआ था इसका जरूर विश्लेषण किया जाना चाहिए कि आखिर चुनाव हारते ही हमारे जुझारू नेता चुनावी मैदान से मुंह क्यों मोड़ लेते हैं।

अर्जुन राठौर

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