अभिलाषा : आशीष कौर होरा, इंदौर

बांध लिया है तुमने तन को मन को तुम न बंधने दो तुम हो रचनाकार जगत की खुद को यूं न मिटने दो

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abhilasha

बांध लिया है तुमने तन को
मन को तुम न बंधने दो
तुम हो रचनाकार जगत की
खुद को यूं न मिटने दो
सृजनकार हो जननी हो तुम
कभी न खुद को गिरने दो
हर युग में अनमोल हो तुम
इसका भी दंभ भरने दो
ना ढूंढो खुद में कमजोरी
चाहत को तुम उड़ने दो
ख्वाहिशों के चंद टुकड़ों को
जाया तुम न होने दो
गर्वित मन से उम्मीदों को
होंठो की मुस्कान से भर दो
मृदुल हृदय की झंकारों से
जल थल नभ को तुम वर दो
और स्वयं की दिव्य ज्योति को
संचारित कर अलख भरो
रचो पंख बुलंद हौसलों के
अन्याय का प्रतिकार करो
जीवन है प्रदेय तुम्हारा
ना उसका अपमान करो
स्वाभिमानी और अभिमानी बन
स्वमूल्यों का सम्मान करो
सर्वज्ञता तुम सभ्यता तुम
चेतना सम्पन्न कृति तुम
आसमान, अंतरिक्ष को चूमो
गरिमा का विस्तार करो
हो अस्तित्व अलहदा तुम भी
अपना भी यशगान करो
तुम हो शक्ति तुम हो भक्ति
तुमसे ही है जग की हस्ती
गढ़ो स्वंय का स्वर्ण सिंहासन
सपनों को साकार करो
बांध लिया है तुमने तन को
मन को तुम न बंधने दो !