2 घंटे में इंदौर से भोपाल का सफर होगा पूरा, 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से बनेगा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे

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By Raj RathorePublished On: May 5, 2026
Indore to Bhopal Green Field Expressway

मध्य प्रदेश में बहुप्रतीक्षित भोपाल–इंदौर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस हाई-स्पीड कॉरिडोर के जरिए दोनों प्रमुख शहरों के बीच यात्रा और तेज व सुगम होगी, लेकिन इसके साथ ही वन क्षेत्र पर प्रभाव को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।

नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने इस प्रोजेक्ट के लिए कंसल्टेंट नियुक्त कर दिया है और फिलहाल डिजाइन तैयार करने का काम जारी है। वहीं, रायसेन, भोपाल और सीहोर के इछावर क्षेत्र में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।

यह एक्सप्रेस-वे भोपाल से लगभग 30 किमी दूरी पर रायसेन जिले के इटाया कला क्षेत्र से शुरू होगा और देवास जिले के करनावद के पास समाप्त होगा। सरकार का लक्ष्य है कि इस प्रोजेक्ट को 2028 में होने वाले सिंहस्थ से पहले पूरा कर लिया जाए। इसके लिए करीब 10 हजार करोड़ रुपये का बजट अनुमानित किया गया है।

158 हेक्टेयर भूमि का होगा इस्तेमाल

इस प्रोजेक्ट के चलते वन क्षेत्र पर भी असर पड़ेगा। भोपाल में करीब 24 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होगी, जबकि रायसेन को जोड़ने पर यह आंकड़ा 52 हेक्टेयर तक पहुंच जाएगा। पूरे प्रोजेक्ट के तहत लगभग 158.25 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग इस हाई-स्पीड कॉरिडोर के निर्माण में किया जाएगा।

दूरी होगी कम

फिलहाल भोपाल और इंदौर के बीच की दूरी लगभग 188 से 210 किमी के बीच है, लेकिन नए एक्सप्रेस-वे के बनने के बाद यह दूरी करीब 50 किमी तक कम हो जाएगी। यात्रा का समय घटकर लगभग 1.30 से 2 घंटे के बीच रह जाएगा, जिससे यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।

किन जिलों से गुजरेगा कॉरिडोर

यह हाई-स्पीड कॉरिडोर रायसेन के इटाया कला से शुरू होकर इछावर, सीहोर, आष्टा और देवास होते हुए करनावद तक जाएगा। इस मार्ग से भोपाल, सीहोर, रायसेन और देवास जिलों की करीब 65 लाख आबादी को सीधा लाभ मिलेगा।

अभी भोपाल से इंदौर जाने के लिए मुख्य रूप से बैरागढ़-सीहोर मार्ग (210 किमी) और नीलबड़-रातीबड़ मार्ग (करीब 200 किमी) का उपयोग किया जाता है। नए एक्सप्रेस-वे के बनने से यह यात्रा न केवल छोटी होगी, बल्कि अधिक सुरक्षित और तेज भी हो जाएगी।

क्या होंगे बड़े फायदे

इस परियोजना से ट्रैफिक जाम में कमी आएगी और पेट्रोल-डीजल की बचत होगी। इसके साथ ही व्यापार और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आने की संभावना है, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

2019 से शुरू हुई योजना

इस प्रोजेक्ट की प्लानिंग 2019 में शुरू हुई थी। अब 2026 में डिजाइन और जमीन अधिग्रहण का काम चल रहा है और लक्ष्य रखा गया है कि 2028 सिंहस्थ से पहले इसे पूरा कर लिया जाए।