महाकाल मंदिर के शिखर पर होगा ब्रह्म ध्वज का आरोहण, 2000 साल पुरानी सम्राट विक्रमादित्य की परंपरा फिर होगी जीवित

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By Pinal PatidarPublished On: March 14, 2026

उज्जैन में स्थित पवित्र महाकालेश्वर मंदिर के आंगन में हर त्योहार बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। हिंदू नववर्ष और गुड़ी पड़वा के अवसर पर भी मंदिर में विशेष तैयारियां चल रही हैं। इस पावन दिन मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज फहराया जाएगा, जिसे शुभता और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। मंदिर प्रशासन और श्रद्धालु इस परंपरा को उत्साह के साथ निभाने की तैयारी में जुटे हुए हैं।

सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ी प्राचीन परंपरा

इतिहासकारों के अनुसार करीब 2000 वर्ष पहले उज्जैन के महान शासक सम्राट विक्रमादित्य ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। कहा जाता है कि वे हर साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी हिंदू नववर्ष के दिन ब्रह्म ध्वज का आरोहण करते थे। इस ऐतिहासिक परंपरा को यादगार बनाने के लिए उस समय विशेष सिक्के भी जारी किए गए थे। इन दुर्लभ सिक्कों को आज भी महिदपुर स्थित अश्विनी शोध संस्थान में सुरक्षित रखा गया है।

ब्रह्म ध्वज का धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्व

महाकाल मंदिर के शिखर पर चढ़ाया जाने वाला ब्रह्म ध्वज साहस, शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है। केसरिया रंग के इस ध्वज में दो पताकाएं होती हैं और बीच में सूर्य का चिन्ह बना होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह ध्वज चारों दिशाओं में विजय और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है। इसलिए गुड़ी पड़वा के दिन इसे फहराना अत्यंत शुभ माना जाता है।

उज्जयिनी मुद्रा का ऐतिहासिक महत्व

सम्राट विक्रमादित्य ने इस परंपरा से जुड़ी “उज्जयिनी मुद्रा” भी जारी की थी। इस प्राचीन सिक्के के एक तरफ भगवान शिव सूर्यदंड के साथ दर्शाए गए हैं, जबकि दूसरी तरफ उज्जयिनी का विशेष चिह्न अंकित है। उस समय उज्जैन अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, इसलिए इन मुद्राओं का आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व भी काफी अधिक था।

उज्जयिनी चिन्ह का अर्थ और संदेश

उज्जयिनी मुद्रा के मध्य में प्लस (+) जैसा चिन्ह बना होता था और उसकी चारों भुजाओं पर गोलाकार आकृतियां होती थीं। इतिहासकारों के अनुसार इसका अर्थ यह था कि उज्जैन पृथ्वी के केंद्र में स्थित एक प्रमुख नगर है, जो जल, वायु और स्थल मार्गों के जरिए दूसरे देशों से जुड़ा हुआ था। यह चिन्ह उस समय उज्जैन की समृद्धि और वैश्विक संपर्क का प्रतीक माना जाता था।

परंपरा को पुनर्जीवित करने की सरकारी पहल

इस प्राचीन परंपरा को फिर से जीवंत करने के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पहल की है। उनके निर्देश पर ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर के शिखर के साथ-साथ शहर के प्रमुख भवनों पर भी ब्रह्म ध्वज फहराने की परंपरा शुरू की जा रही है, ताकि उज्जैन की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को नई पहचान मिल सके।

श्रद्धालुओं को भी मिला ध्वज चढ़ाने का अवसर

इस परंपरा की खास बात यह है कि अब आम श्रद्धालु भी महाकाल मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज चढ़वा सकते हैं। इसके लिए मंदिर कार्यालय में 1100 रुपये की रसीद कटवानी होती है। इसके अलावा ध्वज की खरीद, पूजन, अखाड़े को भेंट और शिखर पर ध्वज लगाने वाले कर्मचारियों का भुगतान अलग से करना पड़ता है। कुल मिलाकर करीब 3 हजार रुपये के खर्च में श्रद्धालु अपने नाम से महाकाल मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज चढ़वा सकते हैं।