Indore Development Authority : इंदौर के विकास का जिम्मा संभालने वाली एजेंसी इन दिनों खुद ही अपनी आधारभूत संरचना के संकट से गुजर रही है। एक तरफ जहां शहर में हजार करोड़ रुपये के विकास कार्य चल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इन कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाला तंत्र बेहद कमजोर नजर आ रहा है। हालात यह हैं कि करोड़ों के प्रोजेक्ट्स बिना पर्याप्त तकनीकी देखरेख के आगे बढ़ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, विकास प्राधिकरण के पास इस समय करीब 1000 करोड़ रुपये की लागत के प्रोजेक्ट्स जमीनी स्तर पर चल रहे हैं। इसके अलावा, आने वाले समय में लगभग 2000 करोड़ रुपये की नई परियोजनाओं की शुरुआत होनी है। इतनी बड़ी राशि और जिम्मेदारी होने के बावजूद, एजेंसी के पास इंजीनियरों और तकनीकी स्टाफ की भारी कमी है।
जिम्मेदारियों का बोझ और खाली कुर्सियां
किसी भी निर्माण एजेंसी की रीढ़ उसके इंजीनियर होते हैं, लेकिन यहाँ स्थिति चिंताजनक है। आईडीए को अभी 106 इंजीनियर की जरुरत है लेकिन फिलहाल उसके पास मात्र 30 इंजीनियर ही है। सरकार को पिछले तीन सालों में 12 बार पत्र लिखे जा चूका है लेकिन उसके बाद भी कोई समाधान नहीं है। आईडीए की हालत इतनी खराब है की स्वीकृत 386 इंजीनियर, अफसर, बाबुओं में से सिर्फ 124 कर्मचारी ही बचे है।
नियमानुसार बड़े प्रोजेक्ट्स की निगरानी के लिए हर स्तर पर कनिष्ठ यंत्रियों (Junior Engineers) से लेकर कार्यपालन यंत्रियों (Executive Engineers) तक का एक पूरा ढांचा होना चाहिए। वर्तमान में चल रहे प्रोजेक्ट्स की संख्या और उनके बजट के मुकाबले उपलब्ध स्टाफ ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी अमले की कमी का सीधा असर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और समय सीमा पर पड़ता है। जब एक ही इंजीनियर के पास क्षमता से अधिक साइट्स की जिम्मेदारी होती है, तो नियमित निरीक्षण संभव नहीं हो पाता। इसका खामियाजा अंततः शहर की जनता को खराब गुणवत्ता वाली सड़कों और इमारतों के रूप में भुगतना पड़ता है।
भविष्य की योजनाओं पर सवालिया निशान
एजेंसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन 2000 करोड़ रुपये के नए प्रोजेक्ट्स को शुरू करने की है जो पाइपलाइन में हैं। जब वर्तमान में चल रहे कार्यों की ही ठीक से मॉनिटरिंग नहीं हो पा रही है, तो नए कार्यों का बोझ यह ढांचा कैसे उठा पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।
विभागीय सूत्रों के मुताबिक, लंबे समय से रिक्त पदों पर भर्ती नहीं होने और प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों के वापस जाने से यह संकट गहराया है। प्रशासनिक स्तर पर बार-बार मांग उठाने के बावजूद अभी तक पर्याप्त संख्या में तकनीकी स्टाफ की तैनाती नहीं हो सकी है। ऐसे में शहर के सुनियोजित विकास का सपना फाइलों और वादों के बीच उलझता दिखाई दे रहा है।











