भोपाल: मध्य प्रदेश के लाखों सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा संबंधी मामलों को लेकर राज्य सरकार को एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है, जिससे कर्मचारियों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए अदालत के चक्कर काटने से मुक्ति मिल सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार को एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे कर्मचारियों के विवाद विभागीय स्तर पर ही सुलझ जाएं।
यह टिप्पणी हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों से जुड़े सेवा मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए की है। अदालत का मानना है कि ट्रांसफर, प्रमोशन, इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) और वरिष्ठता (सीनियरिटी) जैसे मुद्दे प्रशासनिक प्रकृति के हैं और इनका समाधान दफ्तरों में ही होना चाहिए।
क्यों पड़ी इस सुझाव की ज़रूरत?
दरअसल, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में हर साल हजारों याचिकाएं सिर्फ सेवा संबंधी विवादों को लेकर दायर होती हैं। इनमें से अधिकतर मामले मामूली होते हैं, जिन्हें विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आसानी से सुलझा सकते हैं। इन याचिकाओं के कारण न केवल न्यायपालिका पर काम का बोझ बढ़ता है, बल्कि कर्मचारियों को भी बेवजह आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्हें न्याय के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है।
6 लाख कर्मचारियों को सीधा फायदा
अगर राज्य सरकार हाईकोर्ट के इस सुझाव पर अमल करती है, तो इसका सीधा लाभ प्रदेश के लगभग 6 लाख सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को मिलेगा। उन्हें अपनी नौकरी से जुड़ी सामान्य समस्याओं के समाधान के लिए वकीलों और अदालतों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे प्रशासनिक कार्यों में भी पारदर्शिता और तेजी आने की उम्मीद है।
क्या कहा हाईकोर्ट ने?
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह देखना दुखद है कि कर्मचारियों को छोटे-छोटे मामलों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। कोर्ट ने राज्य सरकार को एक मजबूत और प्रभावी आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र (Internal Grievance Redressal Mechanism) विकसित करने की सलाह दी है।
कोर्ट के अनुसार, इस तंत्र में वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारियों को शामिल किया जाना चाहिए, जो निष्पक्ष रूप से मामलों की सुनवाई कर सकें और एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर उनका निपटारा कर सकें। इससे न केवल कर्मचारियों का व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा, बल्कि अदालतों का कीमती समय भी बचेगा, जिसका उपयोग गंभीर आपराधिक और दीवानी मामलों के निपटारे में किया जा सकेगा।
अब सरकार के पाले में गेंद
हाईकोर्ट के इस अहम सुझाव के बाद अब गेंद पूरी तरह से राज्य सरकार के पाले में है। सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करते हुए एक ठोस कार्ययोजना बनानी होगी। यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो यह कर्मचारी हित में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है और मध्य प्रदेश अन्य राज्यों के लिए एक मिसाल बन सकता है।











