शनिवार को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अचानक यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री का दौरा किया, यह वही स्थल है जहां लोगों को इतिहास की भयंकर त्रासदी झेलनी पड़ी थी। उन्होंने फैक्ट्री का विस्तृत निरीक्षण किया और इस दौरान गैस राहत विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी उनके साथ रहे, जिनसे उन्होंने लंबी बातचीत की। यह फैक्ट्री 85 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई है। उल्लेखनीय है कि इसके एक दिन पहले, यानी शुक्रवार को भोपाल जिला प्रशासन और गैस राहत विभाग के अधिकारी फैक्ट्री और संबंधित जमीन की फाइलों की समीक्षा कर चुके थे।
फैक्ट्री दौरे की कुछ जरुरी बातें
- यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री करीब 85 एकड़ क्षेत्र में स्थित है, और इससे संबंधित दस्तावेजों की जांच जिला प्रशासन तथा गैस राहत विभाग द्वारा एक दिन पहले ही की जा चुकी थी।
- पीथमपुर में विषैले कचरे के निस्तारण को लेकर तीखा विरोध देखने को मिला, हालांकि अंत में कचरे और उससे बनी राख को सभी सुरक्षा मानकों के तहत जमीन में सुरक्षित रूप से दबा दिया गया।
- शनिवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बिना पूर्व सूचना यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री का दौरा किया, जहां उन्होंने परिसर का जायजा लिया और गैस राहत विभाग के अधिकारियों के साथ विस्तार से विचार-विमर्श किया।
- भोपाल गैस हादसा विश्व की सबसे भयावह औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता है, जब 2–3 दिसंबर 1984 की रात मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव ने हजारों लोगों की जान ले ली थी।
- करीब चार दशकों से फैक्ट्री परिसर में रखा 337 टन विषैला कचरा जनवरी 2025 में पीथमपुर ले जाकर निस्तारित किया गया, जिसे 12 कंटेनरों में पैक कर परिवहन किया गया था।
40 साल पुराण कचरा परिसर से हटाया गया
यूनियन कार्बाइड परिसर में दशकों से जमा कचरे को पिछले वर्ष जनवरी में हटाकर पीथमपुर पहुंचाया गया, जहां उसका सुरक्षित तरीके से निष्पादन किया गया। यह विषैला पदार्थ 12 कंटेनरों में सील कर ले जाया गया था। पीथमपुर में इसके निपटान को लेकर तीखा विरोध भी सामने आया, लेकिन अंततः कचरे को पूरी तरह नष्ट कर उसकी अवशेष राख को भी जमीन में दफन कर दिया गया।
दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक आपदाओं में से एक
गौरतलब है कि भोपाल गैस कांड को विश्व की सबसे भयावह औद्योगिक आपदाओं में गिना जाता है। करीब 41 वर्ष पहले, 2–3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात जेपी नगर स्थित यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के टैंक नंबर 610 से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ था। उस खौफनाक रात की यादें आज भी सिहरन पैदा कर देती हैं। प्रत्यक्षदर्शियों और उस समय की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के अनुसार, हालात इतने भयावह थे कि सड़कों पर शवों के ढेर लग गए थे, उन्हें उठाने के लिए वाहन कम पड़ गए और अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक संसाधन भी नाकाफी साबित हुए।









