Union Carbide Waste Disposal : 1984 में भोपाल में हुए गैस त्रासदी के दौरान यूनियन कार्बाइड प्लांट से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस के रिसाव से हजारों लोगों की जानें गईं और कई लोग अपंग हो गए। अब, 40 साल बाद, उसी प्लांट के कचरे को निपटाने का काम शुरू किया गया है। मध्य प्रदेश के पीथमपुर स्थित औद्योगिक क्षेत्र में यूनियन कार्बाइड के बंद प्लांट से 337 टन खतरनाक कचरे को निपटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस कचरे में मुख्य रूप से कीटनाशकों के अवशेष, रिएक्टर अवशेष, और अन्य प्रदूषक तत्व शामिल हैं।
337 टन कचरे में से 10 टन कचरा 2 जनवरी को पीथमपुर के विशेष संयंत्र में भेजा गया था। इस कचरे में कीटनाशकों और अन्य अवशेषों का मिश्रण है, जिसमें से खतरनाक रसायनों का प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर की जा रही है, और किसी भी प्रकार के खतरनाक रसायन जैसे मिथाइल आइसोसाइनेट का कोई अस्तित्व नहीं है।
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Supreme Court का हस्तक्षेप से इनकार
भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े कचरे के निपटान को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि कचरे को पीथमपुर के एक निजी कचरा निपटान संयंत्र में ले जाकर निपटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद, सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ विरोधी समूह इस प्रक्रिया के संभावित पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं और उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की योजना बना रहे हैं।
कचरे में अब कोई खतरनाक रसायनों नहीं बचा हैं
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सरकार और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का दावा है कि कचरे में अब कोई खतरनाक रसायन, जैसे मिथाइल आइसोसाइनेट गैस, नहीं बचा है। वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर, यह माना गया है कि कचरे का प्रभाव अब समाप्त हो चुका है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि निपटान के दौरान वैज्ञानिकों की टीम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी मौजूद रहेंगे, ताकि सुरक्षा मानकों का पालन किया जा सके।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कचरे के निपटान पर जताई थी आपत्ति
हालांकि, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस कचरे के निपटान पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया से संभावित रूप से पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं। प्रदर्शनकारियों ने इस निपटान प्रक्रिया को रोकने के लिए उच्च न्यायालय में जाने की योजना बनाई है। सरकार ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए यह दावा किया है कि निपटान पूरी तरह से सुरक्षित है और इसके बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए ‘जन संवाद’ कार्यक्रम भी चलाए गए हैं।
निपटान प्रक्रिया की निगरानी
निपटान प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। पुलिस प्रशासन ने 500 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात किया है और पूरी प्रक्रिया की निगरानी केंद्र और राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही है। इंदौर संभाग के आयुक्त दीपक सिंह ने इस बात की पुष्टि की है कि यह पूरी प्रक्रिया सुरक्षा के उच्च मानकों के तहत की जा रही है।