वाराणसी भारत के उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे एक बेहद ही खूबसूरत शहर है। हिन्दुओं के तीर्थ स्थलों में से एक है। ये काशी विश्वनाथ जी का घर है इस शहर के जितने रंग उतने नाम ।आस्था के रंग से लेकर क्रांति के रंगो में भी खूब रंगा हुआ है वाराणसी यहाँ के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने चंद्रशेखर आज़ाद जैसे स्वतंत्र सेनानी को जन्म दिया है । यहाँ का काशी विश्वनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसके दर्शन करने के लिए हर साल लाखों लोग आते है ।

जगमगाता बनारस रेलवे स्टेशन 

विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है – ‘काशिरित्ते.. आप इवकाशिनासंगृभीता:’। बनारस ,वाराणसी और काशी तीन नामों से जाना जाता है ।वाराणसी का सबसे प्राचीन नाम काशी है।शिव शंभू की नगरी काशी, बाबा भोले का धाम काशी, रौशनी का शहर काशी, बाबा विश्वनाथ का धाम काशी, मां गंगा के आशीर्वाद से जगत प्रसिद्ध है।

भैरूनाथ मंदिर बनारस

बनारस के बाबा विश्वनाथ के भव्य मंदिर का विकास विशाल प्रांगण ,अलौकिक आकर्षक छठा देख मन ख़ुशियों से झूम उठता है । मंदिर के गर्भ ग्रह में विराजे भोलेनाथ के दर्शन व दूध से अभिषेक का अवसर से हम धन्य है ।इंदौर की होलकर वंश की माता अहिलयबाई की मूर्ति देख दिल प्रसन्न हो गया । दशाश्वमेघ घाट पर हर शाम आयोजित होने वाली गंगा आरती के लिए सबसे प्रसिद्ध है,हर दिन सैकड़ों लोग इसे देखने आते हैं। गंगा आरती देखना एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

बनारस का काशी विश्वनाथ मंदिर

यहाँ रात्रि में माँ गंगा की भव्य आरती बोट में बैठकर देखना व फिर अस्सी घाट तक नौका विहार कर अनेक़ो घाट के दर्शन जिसकी अपनी कहानी है ।माँ गंगा पर लिखी काव्य रचना भी मेरे द्वारा माँ गंगा को सुनाई ।यहाँ देख लगता है ,सच में भारत बदल रहा है । बाबा भोलेनाथ की नगरी बनारस, घाट और मंदिरों के लिए भी जाना जाता है ।गंगा जी के आसपास दिलों को छू लेनी वाली प्रकृति है जहां इसे दुनिया से बनारस घूमने आए पर्यटकों को आनंदित कर देता है ।

प्रसिद्ध कचौरी दुकान बनारस

आपने बहुत कुछ देखा होगा लेकिन बनारस के रंग कुछ और ही है ।काशी कहो, या बनारस, या फिर कहो वाराणसी , इसके हर नाम में सुंदरता झलकती है । वाराणसी में गंगा नदी के किनारे शहर में 88 घाट हैं। अधिकांश घाट स्नान और पूजा समारोह घाट हैं, जबकि दो घाटों का उपयोग विशेष रूप से श्मशान स्थलों के रूप में किया जाता हैं। दशाश्वमेघ शताब्दियों से विख्यात है।मणिकर्णिका को मुक्ति क्षेत्र भी कहा जाता है। पंचगंगा में पाँच नदियों के धाराओं मिलन है।

बनारस की फ़ेमस मलइयों का आनंद

नारदीय पुराण तथा काशी-खण्ड में कहा गया है कि जो मनुष्य पंचगंगा में स्नान करता है वह पंच तत्वों में स्थित इस शरीर को पुनः धारण नही करता, मुक्त हो जाता है। दशाश्वमेध घाट, वह स्थान जहां भगवान ब्रह्मा ने दशा अश्वमेध यज्ञ किया था। यह घाट एक धार्मिक स्थल है और यहां कई तरह के अनुष्ठान किए जाते हैं। विश्वनाथ मंदिर से दो मील की दूरी पर भैरोनाथ का मंदिर है, उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। उनके हाथ में बड़ी एवं मोटे पत्थर की लाठी होने के कारण इन्हें दण्डपाणि भी कहा जाता है।

बनारस का बनारसी पान

तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस रचना प्रारम्भ की थी जो दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अद्भुत ग्रन्थ सम्पन्न हुआ। अस्सी घाट को वह स्थान माना जाता है जहां महान कवि तुलसीदास का निधन हुआ था।तुलसी घाट का विशेष महत्व है । मणिकर्णिका घाट एक प्रसिद्ध घाट है। एक मान्यता के अनुसार माता पार्वती जी का कर्ण फूल यहाँ एक कुंड में गिर गया था, जिसे ढूढने का काम भगवान शंकर जी द्वारा किया गया, जिस कारण इस स्थान का नाम मणिकर्णिका पड़ गया।

बनारस के घाट

संकट मोचन हनुमान जी का भव्य मंदिर है जहाँ श्रद्धालु दर्शन करने अवश्य जाते है । यहाँ शाम गंगा घाट पर गुजरती है तो सुबह गरमागरम कचौरी जलेबियों की महक होती है ।राम भंडार कचौरी जलेबी के यहाँ सुबह सात बजे से देर रात तक लाइन लगी रहती है ।बनारस की चाट भी फ़ेमस है बनारस की पुरातन बनारसी चाट पर काशी के लोग वही चाट खाने जाते है जहाँ हमने भी स्वाद चखा ।

बनारस की पुरातन चाट की दुकान

यहाँ की वो खास मिठाई जिसे मलइयो के नाम से जाना जाता है. बनारसी मलइयो का स्वाद लेने के लिए दूर-दूर से लोग बनारस आते हैं। वाराणसी प्रसिद्ध है बनारसी रेशम, बनारसी साड़ी सूट का बाज़ार है जहाँ अनेको नई नई डिज़ाइन मिल जाएगी ।इसके अलावा मलमल के कपड़े, इत्र, हाथी दांत के काम और मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। यह इन वस्तुओं के लिए एक महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।