शब्दों की सत्ता अनमोल – एक

जब साहित्य जन जन की धड़कन बन जाता है

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राजेश बादल
वैसे तो राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर में सर्दियों की अपनी इंद्रधनुषी छटा देखते ही बनती है ।गुनगुनी धूप और ठंडी ठंडी हवा का साथ सोने में सुहागा बन जाया करता है,लेकिन ढाई तीन बरस पहले नवम्बर की एक सर्द सुबह जयपुर में कलम के सिपाही उबल रहे थे ।साहित्य उत्सव के नाम पर एक जमात अपना विकराल और विकृत चेहरा दिखा रही थी। शब्द संसार का ऐसा बाजारू और भयावह रूप शहर के लोगों ने कभी नहीं देखा था । नई नस्लों के लिए यह डराने वाला सिलसिला था ।

मेरे पुराने मित्र और पैंतीस बरस पहले नव भारत टाइम्स में सहयोगी रहे ईशमधु तलवार तथा उनके मित्रों ने इस तकलीफ देह दौर का मुक़ाबला करने का फ़ैसला किया । प्रलेसं के बैनर तले समानांतर साहित्य उत्सव का ऐलान सुनने के लिए जैसे जयपुर के लोग इंतजार ही कर रहे थे । दो हज़ार अठारह का साल लगते ही शहर में इस नए चरित्र वाले साहित्य उत्सव की शुरुआत हो गई । तीन दिन में ही कोई बारह – चौदह हज़ार लोगों ने अपनी हाज़िरी लगा दी तो ईश मधु तलवार,प्रलेस के प्रदेश अध्यक्ष ऋतुराज और उनकी टीम को लगा कि मेहनत सफल हो गई ।

बाज़ार के लिए रचे जा रहे तथाकथित साहित्य को लोगों ने खारिज़ कर दिया था।हिन्दुस्तानी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को हज़ारों लोग अपना लाड़ प्यार दे रहे थे।किसी भी भाषा को लीजिए -हिंदी हो या उर्दू,तेलुगु हो या तमिल, बंगला हो या उड़िया ,पंजाबी हो या मराठी -हर भाषा के साहित्य का जादू इस साहित्य उत्सव में सर चढ़कर बोल रहा था । कुल चौवन सत्रों में अदब के सारे सरोकारों को समेट लिया गया। शहर का बुद्धिजीवी वर्ग हो या आम पढ़ने लिखने वाला इनसान ,सबने इसे अपनी संतान की तरह दुलारा ।

वैसे तो यह एक प्रतीकात्मक जलसा था , लेकिन जब इतना पसंद किया गया तो दो हज़ार उन्नीस में भी इसका दूसरा संस्करण आयोजित किया गया ।यह भी बेहद कामयाब रहा । इसका फलक विस्तृत था।सौ से अधिक सत्र हुए । क़रीब क़रीब सारी भाषाओं के हाल पर चर्चा हुई । बोलियों में बात हुई और आयोजन अगले जलसे की प्यास लिए संपन्न हो गया ।दूसरी बार भी मुल्क के सारे नामचीन लेखकों, कवियों, अ़फसाना निगारों ने हिस्सा लिया । पड़ोसी नेपाल से भी शब्दसितारे पहुंचे ।

इस बार यानी तीसरे जलसे में मित्र ईशमधु तलवार का न्यौता मिला । ज़बरदस्त आग्रह तीनों दिन यानी 21,22 और 23 फ़रवरी को उपस्थित रहने का था और उन्होंने दो तीन महीने पहले ही यह वादा ले लिया था ।लिहाज़ा मुंबई से वाया दिल्ली रतजगा करते हुए तड़के जयपुर जा पहुंचा । तलवार जी,ऋतुराज , प्रेमचंद गांधी और उनकी टीम से भेंट हुई ।बता दूं कि जयपुर शहर मेरे लिए बहुत ख़ास है । इस शहर में रहते हुए मैं ज़िन्दगी में पहली बार 1988 में टीवी कैमरे के सामने खड़ा हुआ, मुझे नव भारत टाइम्स का राजस्थान संस्करण प्रारंभ करने का सुअवसर मिला और मेरी ज़िन्दगी में मीता जी का प्रवेश हुआ ।इसलिए इस बार इन तीन दिनों की कहानी कल से लगातार ।इस पोस्ट के साथ ईशमधु तलवार की तस्वीर तो यकीनन बनती है । आप भी उनका अभिवादन कर सकते हैं ।