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‘आकाश’ पिता ‘हीरो’ और ‘रोल माॅडल’ का फर्क…! अजय बोकिल की कलम से….

Posted on: 18 Jun 2018 11:40 by krishnpal rathore
‘आकाश’ पिता ‘हीरो’ और ‘रोल माॅडल’ का फर्क…! अजय बोकिल की कलम से….

गनीमत है ‍कि हम में से ज्यादातर पिताअों को यह ठीक से पता नहीं है कि वे अब ‘फादर्स डे’ मटेरियल हैं। इसीलिए 17 जून को मीडिया और बाजार में ‘फादर्स डे’ का हल्ला सुनाई दिया तो अधिकांश पिताअों ने उसे एक बेमौसम बारिश की तरह ही लिया। क्योंकि मां और बाप जैसे अपरिभाषेय रिश्तों को किसी ‘डे’ तक समेटना अपने आप में कुछ बेतुका और बनावटी सा लगता है। लेकिन जिस तरह तकरीबन साल का हर दिन किसी न किसी ‘डे’ में तब्दील होता जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि क्या कोई सहज और सामा‍न्य दिन हमारे पास बचेगा भी या नहीं ? चाहें तो इसे ‘आउट डेटेड’ भारतीय संस्कार ही मानें कि हमने मां बाप को किसी दिन तक मर्यादित करने का दुस्साहस नहीं किया। माता पिता को भगवान मानकर उन्हें वंदन करने, उनका कहा आदर भाव से मानने और उन्हें आजीवन एक सुरक्षित छतरी या बिना किसी प्रीमियम के परमानेंट इंश्योरेंस मानने का रिवाज इस देश में रहा है। हमारे यहां मां-बाप दिखावे की वस्तु कभी नहीं रहे। लेकिन वक्त की बलिहारी कि अब पिताअोंको पता चलता है कि एक दिन उनके नाम भी आरक्षित है। हालांकि यूरोप में कैथोलिक ईसाई यह दिन मध्यकाल से मनाते आ रहे हैं। वे इसे संत जोसेफ की याद में मनाते थे। बाद में फादर्स डे अमेरिका पहुंचा और भावनाअों के नकदीकरण के रास्ते से होता हुआ पूरी दनिया में पसर गया। दुनिया के ज्यादातर देशों में यह जून के तीसरे रविवार को जबकि कुछ देशों में दूसरे रविवार को भी मनाया जाता है।fathers day का दिखावा के लिए इमेज परिणाम

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इस बार ‘फादर्स डे’ पर जो रेडीमेड कोट, मैसेज, वाॅल पेपर्स, एसएमएस और इमेजेस आदि की जो बमबारी हुई, उससे लगा कि ‘डे’ के रूप में पिता अपने को ही ‘रिइन्वेट’ करने की कोशिश कर रहे हैं। बाजार इसमें उत्प्रेरक की भूमिका जबर्दस्त ढंग से निभा रहा है। वह पिताअों को बता रहा था कि ‘नाऊ यू आर फादर।‘ गोया पिताअों को पता ही नहीं ‍कि वे पिता हैं? वे अनजाने में ही पिता बन गए? अब बन ही गए हैं तो पिता बने ही रहना है या फिर पिताअों को समझ जाना चाहिए कि उनके ‘फादर’ में कन्वर्ट होने का राइट टाइम आ गया है, वे अप-डेट हो जाएं। ‘फादर्स डे’ पर आए अधिकांश संदेशों में भावुकता तो थी, लेकिन वह भीतर से कितनी उपजी थी, कहना कठिन है। और कोई भी ‘डे’ हो, वह सेलेब्रिटीज के लिए अपने आप को एक्स्पोज करने की दावत होती है। बल्कि लगता यह है कि सारे ‘डे’ दरसअल सेलेब्रिटीज को पालने पोसने के लिए ही मनाए जाते हैं। इस मौके पर कई भावुक संदेश सोशल मीडिया में तैरने लगते हैं। अभिनेत्री प्रिटी जिंटा ने अपने अंदाज में ‘फादर्स डे’ को सेलिब्रेट किया। उन्होंने ट्विटर पर अपने पिता को लिखा – ‘जो किसी व्यक्ति के हृदय में रहते हैं वे मरते नहीं हैं, धन्यवाद कि आपने मुझे स्वयं का सम्मान करना सिखाया, आपने मुझे सही चीजों के लिए लड़ना सिखाया, आपने मुझे मजबूत व स्वतंत्र बनाया और सबसे महत्वपूर्ण यह कि आपने मुझे ईमानदारी व दयाशीलता का महत्व सिखाया। आपसे मैं हमेशा प्यार करूंगी और आपको मिस करूंगी, आप हमेशा मेरे हीरो हैं, हैप्पी फादर्स डे। यह बात दूसरी है कि दुनिया के 99.99 फीसदी फादर अपनी संतानों के लिए यही सब करते हैं, करते आए हैं। वैसे ‘फादर्स डे’ पर कई संतानों को अपने ‘फादर’ ‘हीरो’ नजर आए। कुछ लोगों ने कविताअों के जरिए यह जताने की कोशिश की कि वे उनके पिता की तरह अपनी संतानों के पिता नहीं बन पाए। इसमें पोशीदा भाव यह था कि कहीं न कहीं उनके पिता का अस्तित्व कई गुना ज्यादा बड़ा था बजाए पिता के रूप में उनके अपने वजूद के।

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यहां सवाल यह भी है कि पिता, पिता क्यों है? उसे ‘फादर’ बताकर हम क्या नया ‍सिद्ध करना चाह रहे हैं? क्या यह महज शब्दों का खेल है या फिर यह नए कल्चर में रिश्तों की नई परिभाषा है? वरना क्या पिता को पता नहीं होता कि वह पिता है अथवा वह पिता का वैसा रोल नहीं निभा पा रहा है, जो बदले जमाने के पिता से अपेक्षित है? तो फिर बीते जमाने के पिता या बाप तथा आज के ‘फादर’ में बेसिक फर्क क्या है? नई पीढ़ी को ‘पिता’ से ज्यादा ‘फादर’ का क्रेज क्यों है? इसके कई कारण हैं। दो-तीन दशकों पहले तक पिता, बापू या बाबा पूरे परिवार के लिए आकाश की भूमिका में रहता था। वह एक अनंत छाता था, जिसके नीचे पूरे परिवार के सुख-दुख, आशा-आकांक्षा पलते थे। वो पिता बोलते कम थे, समझते ज्यादा थे। वो पिता दिखाते कम थे, निभाते ज्यादा थे। वो पिता घरों में एक अघोषित सीसीटीवी कैमरे की तरह थे, जिसके इंस्टाल होने की सूचना गेट पर लिखने की जरूरत नहीं पड़ती थी। वे जज्बातों को विवेक के सेंसर से पकड़ते थे। उनकी नजर चौतरफा थी और हाथ सदा पीठ पर रहता था। वो अपने पिता होने को लेकर ‘पोज’ नहीं करते थे। लेकिन पूरे परिवार की प्रगति, व्यवहार, संस्कार, परंपरा, नीति-अनीति और उम्मीदों की उड़ान तक का रिमोट कंट्रोल उन्हीं के हाथ में रहता था। अब पिता की भूमिका काफी बदली है। अब बच्चों और बाप के बीच दोस्ताना रिश्ता ज्यादा है। उसमें कोई ‘टेरर’ नहीं है, लेकिन इतिहास को आगे बढ़ाने का मौन संकल्प भी नहीं है। पिता अब ऐसा ‘फादर’ है जो बच्चों के ‘बेस्ट विशेज’ में अपने रिश्ते की आश्वस्ति ढूंढता है। ऐसी –‘विशेज’ जो शायद केवल एक साल के लिए ही है। अगले साल ये ‘विशेज’ उसी गर्माहट और जज्बे के साथ व्यक्त होंगी, इसकी गारंटी नहीं है। पुराने ‘पिता’ की तुलना में ‘फादर’ ज्यादा मैकेनिकल है। वह ज्यादा ‘एडजेस्टीबल’ भी है। वह बच्चों का ‘हीरो’ और रोल माॅडल इत्यादि भी है। वह परिवार की खीर में पगा ऐसा काजू है, जिसे अपनी ही संतानों ने अलग निकाल कर एकाकी चखने की कोशिश की है।

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‘फादर’ के फैशन से हटकर भारतीय संस्कृति में पिता की स्थिति देव तुल्य रही है। वह खामोशी से देता रहा है, हंसते हुए सारा बोझ उठाता रहा है। वह सर्वव्यापी है। लेकिन होकर भी तस्वीरों में दिखना नहीं चाहता। क्योंकि वह जो करता है, जो जीता है, वह सहज मानवीय कर्तव्य है। मां जन्म देती है। लेकिन पिता साया बनकर आजीवन खड़ा रहता है। वह तलवारों के वार ऊपर ही ऊपर झेल जाता रहा है। उसने कभी ढाल नहीं मांगी। मांगा तो केवल अपनी अगली पीढ़ी से अच्छा मनुष्य बनने की गारंटी और बेस्ट विशेज। ‘फादर्स डे’ पर इस बार गूगल ने हैंड प्रिंट डायनोसोर का डूडल खास तौर से जारी किया। इसमें हथेली के आकार से डायनोसोर तैयार किए गए थे। इसका निश्चित संदेश क्या था, समझना मुश्किल है। क्या यह पिता की डायनोसोर से तुलना थी? फादर्स डे पर एक अंग्रेजी संदेश काबिले गौर था। इसमें पिता को सम्बोिधत करते हुए कहा गया था- ‘आप दुनिया के लिए पिता हैं, लेकिन मेरे आप ही दुनिया हैं।‘

 

 

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