धर्मव्रत / त्यौहार

गंगा दशमी आज, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा

आज गंगा दशमी है और इसे गंगा दशहरा से भी जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी पर गंगा दशहरे का त्यौहार मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गंगा नदी में स्नान करने से जीवन सारे पाप धूल जाते हैं। हर साल गंगा के इसी पर्व गंगा दशहरा को लोग पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाते हैं। लेकिन इस साल सभी गंगा दशमी अपने अपने घर में मनाएंगे। आपको बता दे, शास्त्रों के अनुसार इसी दिन मां गंगा का आगमन धरती पर हुआ था। इस दिन दान करने का भी अति विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि इस दिन मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था।

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ये है गंगा दशमी की तिथि और मुहूर्त –

दशमी तिथि प्रारंभ – 31 मई 2020 को 05:36 बजे शाम
दशमी तिथि समाप्त – 01 जून को 02:57 बजे शाम
हस्त नक्षत्र प्रारंभ- 01 जून को 3 बजकर एक मिनट पर सुबह
हस्त नक्षत्र समाप्त- 02 जून को 01 बजकर 18 मिनट, सुबह

घर पर ऐसे करें गंगा दशमी की पूजा –

  • इस लॉकडाउन के बीच आपका गंगा घाट पर जाना नहीं हो पाएगा इसलिए घर में नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • इस दिन स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • स्नान के दौरान ऊं नम: शिवाय नारायण्यै दशहराय गंगाय नम: का जाप करें।
  • इस दिन 10 अंका का विशेष महत्व है।
  • इस दिन पूजा करते समय सभी सामग्रियों को 10 की मात्रा में चढ़ाएं।

ये है गंगा दशमी की पौराणिक कथा –

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि सत्य युग में, सगर नामक एक राजा था जो सूर्यवंश राज-कुल पर शासन करता था। राजा सगर राजा भागीरथ के पूर्वज थे। एक बार, राजा सगर ने अपनी उत्कृष्टता और संप्रभुता साबित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ के परिणामों और चिंता व भय के कारण भगवान इंद्र डर गए और उन्होंने अश्वमेध यज्ञ के घोड़ों को चुरा लिया, ताकि यह पूरा न हो सके। उन्होंने ऋषि कपिला के आश्रम में घोड़ों को छोड़ दिया। जब राजा सगर और उनके पुत्रों को घोड़ों के बारे में पता चला, तो उन्होंने गलती से ऋषि कपिला को अपने घोड़ों को चुरा लेने वाले व्यक्ति के रूप में देखा।

इस प्रकार, क्रोध और प्रतिशोध में, राजा के सभी पुत्र पवित्र ऋषि पर हमला करने वाले थे। लेकिन इससे पहले कि वे इस तरह के पापपूर्ण कृत्य को करते, ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया और परिणामस्वरूप, वे सभी जल गए। पूर्ण परिदृश्य के बारे में जानने पर, ऋषि कपिला ने राजा सगर के आयुष्मान नाम के पोते को घोड़े लौटा दिए। उन्होंने ऋषि से अपने श्राप को वापस लेने का अनुरोध किया। इसके लिए, ऋषि कपिला ने उनसे कहा कि वे अपने श्राप से तभी छुटकारा पा सकते हैं जब देवी गंगा पृथ्वी पर आकर उन सभी को अपने दिव्य जल से शुद्ध करती हैं। बाद में, भागीरथ, राजा के उत्तराधिकारियों में से एक ने देवताओं की मदद लेने और पिछले कर्म से छुटकारा पाने और अपने पूर्वजों की आत्माओं की शुद्धि करने के लिए घोर तपस्या की।

वह जानता था कि केवल गंगा ही उन्हें पवित्र करने की शक्ति रखती है। भागीरथ ने कठोर तपस्या की और आखिरकार युगों के बाद, भगवान ब्रह्मा ने उन्हें आश्वासन दिया कि देवी गंगा पृथ्वी पर अवतरित होंगी और उनकी मदद करेंगी। लेकिन फिर भी, एक बड़ी दुविधा थी क्योंकि गंगा का बहाव इतना मजबूत था कि यह पृथ्वी को पूरी तरह से नष्ट कर सकता था। भगवान ब्रह्मा ने भागीरथ को भगवान शिव से अपने बालों से नदी को छोड़ने का अनुरोध करने के लिए कहा, क्योंकि वह एकमात्र ऐसे हैं जो गंगा के प्रवाह को नियंत्रित कर सकते हैं। भागीरथ की भक्ति और सच्ची तपस्या के कारण, भगवान शिव सहमत हो गये और इस तरह गंगा पृथ्वी पर आईं और उनके पूर्वजों की आत्माओं को शुद्ध किया।