सियासी पतंगबाजी के दौर में असली पतंगों का यूं बेखौफ उड़ना

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अजय बोकिल

इस देश में बारहों महीने चलने वाली राजनीतिक पतंगबाजी के इस दौर में भी संक्रांति के मौके पर लोग असली पतंग उड़ाना अभी नहीं भूले हैं, यह देखना सचमुच सुखद है। सुखद इसलिए भी है क्योंकि इंटरनेट और व्हाट्सएप के हमलों के बीच मासूम-सी पतंग अभी अपनी जान बचाए हुए है। सुखद इसलिए भी है क्योंकि वाहिद पंतग ही बची है, जो अभी तक हिंदू-मुसलमान में तकसीम नहीं हो पाई है। सुखद इसलिए भी है क्योंकि पंतगों ने पारंपरिक शक्ल के साथ कई नए और आकर्षक रूप धर लिए हैं। सुखद इसलिए भी है क्योंकि मौसम की बेवफाई अभी पतंगबाजी को नेस्तनाबूद नहीं कर सकी है।

एक जमाने में पंतग उड़ाना दीवानों और फुरसती लोगों का शौक माना जाता था। क्योंकि पतंग उड़ाने, दूसरे की पतंग काटने और उसे लूटने की दीवानगी घड़ी के कांटों की परवाह नहीं करती थी। उसे उड़ाने के लिए मकान की छतों से लेकर मैदानों तक कोई भी वो जगह मुफीद थी, जहां से खुला आसमान नजर आ सकता था। आज की फ्लै ट संस्कृति में वो सुख कहां? इसके बावजूद पतंगबाजी में एक अनोखा आकर्षण तब भी था और आज भी है। भोपाल जैसे शहर में मकर संक्रांति के मौके पर फुटपाथ पर भी पतंगों की दुकाने देखीं तो मन की पतंग भी उड़ने से रूक न सकी। वही डोर, वही मांजा, वही चरखी, वही मोल भाव और वही कोमलांगी की तरह सहेज कर पतंग को घर तक लाना। आजकल तो बाजार में पतंगों की रेंज मौजूद है। फिर भी पारंपरिक कागज की पंतग का जलवा अब भी कायम है, क्योंकि उसे लूटने का अलग ही आनंद है। दरअसल इन पतंगों की सादगी ही उनकी ताकत है।

यूं तो पतंग कभी भी, कहीं भी उड़ाई जा सकती है, लेकिन इसमें मौसम की मेहरबानी जरूरी है। भारत में तो मकर संक्रांति और सूर्य के उत्तरायण होने का पंतगबाजी से पुराना रिश्ता है। शायद पंतगों को बेखौफ उड़ने देने के लिए ही सूर्य देवता अपनी पोजिशन बदलते हों। आरोग्य शास्त्र के मुता‍िबक शीत लहर के बीच गुनगुनी धूप सेंकते हुए खुले आसमान में पतंग को ढील देना एक शारीरिक और मानसिक व्यायाम भी है। यह बात अलग है कि पतंगबाजी के चलते कई बार झगड़े झांसे भी हो जाते हैं।

दुनिया में पतंगबाजी का सिलसिला कब शुरू हुआ, इसको लेकर कई मत हैं। ज्यादातर लोग इसका श्रेय चीनियों को देते हैं, लेकिन हमारे यहां पंतगबाजी का आगाज त्रेता युग से माना जाता है। कहते हैं तब भगवान राम ने हनुमानजी के साथ मिलकर पतंग उड़ाई थी। इससे इतना तो सिद्ध होता ही है कि पतंग उड़ाने के लिए कम से कम दो लोग चाहिए। मोटे तौर पर इस बात से सभी सहमत हैं कि पंतग की ईजाद एशिया में हुई और आज भी पतंगबाजी के उत्सव ज्यादातर एशिया के देशों में ही होते हैं। यहीं से पतंगबाजी की कला यूरोप पहुंची। लेकिन हम में और उन में फर्क यह है ‍‍कि उन्होंने पतंगबाजी का उपयोग मनोरंजन के अलावा वैज्ञानिक शोध के लिए भी किया। इसी के माध्यम से वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने आसमान में तड़कने वाली बिजली का कारण खोजा था। वियतनाम में जो पतंगें उड़ाई जाती हैं, उनमें पूंछ नहीं होती।

बीसवीं सदी में पतंगबाजी में एक नई क्रांित पंतगों के आकार प्रकार और सौंदर्यबोध को लेकर हुई। यानी पतंगें उड़ें भी और खूबसूरत‍ दिखें भी। इसने पतंगबाजी को और रोमांटिक बना दिया है। नए जमाने की विशाल पतंगें कागज की बजाए हल्के सिंथेटिक मटेरियल की बनी होती हैं। यूं देश में पतंगे बनाने के कई सेंटर हैं, जैसे बरेली, आगरा, पटना, जयपुर, लखनऊ, कोलकाता, जोधपुर और अहमदाबाद आदि। अहमदाबाद में पंतगों का एक सुंदर संग्रहालय भी है। हालांकि उसे देखने कम ही पर्यटक जाते हैं। अहमदाबाद और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में हर साल पतंग फेस्टिवल मनाया जाता है, जहां दुनिया भर के पतंगबाज अपने हुनर का मुजाहिरा करते हैं। हमारे देश में पतंगों का कारोबार करीब डेढ़ हजार करोड़ रू. का बताया जाता है। ये पतंगें करीब 70 हजार परिवारों का पेट भी भरती हैं। हालांकि बढ़ती महंगाई और मोबाइल पर चलने वाली अखंड पतंगबाजी ने असली पतंगबाजी को भी प्रभावित किया है।

गहराई से समझें तो पतंगबाजी दरअसल इंसानी अरमानों की उड़ान का खेल है। यह ‘ऊंचा और ऊंचा’ की भावना से संचालित होता है। बस मन की पतंग को विवेक की डोर से साधे रखना पड़ता है। हर पतंगबाज अपनी पतंग को आकाश में और ऊंचे तक ले जाना चाहता है। पतंगों के आसमान में बिंदास उड़ते रहने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। साधारण पतंग को उड़ने के लिए सबसे बेहतर समय तब होता है, जब वातावरण में कम से कम 6 और अधिकतम 20 किमी की रफ्तार से हवा चले। यानी पतंगें न तो तूफानो में उड़ पाती हैं और न ही अचल हवा में परवाज भर पाती हैं। लिहाजा संक्रांति के मौके पर हवा भी ऐसे मूड में बहती है कि हजारों पतंगें उसके दामन में समा सकें, उड़ सकें।

पतंगों की खूबी यह है कि वे एक धार्मिक मौके पर उड़ने के बावजूद अपनी तासीर में अधार्मिक हैं। उसे उड़ाने का आनंद किसी रंग में रंगा नहीं होता। यहां तक कि इस बार जयपुर में पंतगबाजी ने दो नेताअों की सियासी दूरियों को भी मिटा दिया। इसकी एक वजह शायद यह है कि पतंग को बनाने, उसे उड़ाने और उड़ाते रहने में कई लोगों के हाथ लगते हैं। इसीलिए पतंग हवा से कम ऐसे तमाम लोगों के जज्बे के कारण ज्यादा उड़ती है, जो इसे बनाकर बेचते और अनंत आकाश में अपनी छोटी सी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। सौभाग्य से पतंगों के रंग अभी भी बहुरंगी हैं। हो सकता है कि पतंगों के रंगों को बांटने की तरफ अभी किसी का ध्यान न गया हो।

राजनीतिक पतंगबाजी और असली पतंगबाजी में ही फर्क ये है कि सियासी पतंगबाजी कठपुतली के खेल की माफिक ज्यादा होती है, जबकि वास्तविक पतंगबाजी उसे बांधने वाली डोर को भी कई दफा चुनौती देती लगती है। गनीमत है कि अभी पतंगों को उड़ाने का कोई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पैदा नहीं हुआ है। वो अभी भी इंसानी उंगलियों और अनंत में विहार करने की जिजीविषा से ही संचालित हो रही हैं। दुआ करें कि इसकी गति और नियति यूं ही बनी रहे। एक पतंग ही है जो कट जाने के बाद भी लूटे जाने की हैसियत रखती है। कटी पतंग भी अपने साथ एक कहानी लिए होती है। उसके चाहने वाले भी कम नहीं होते। इसीलिए किसी शायर ने अर्ज किया है-

पतंग कट भी जाए मेरी तो कोई परवाह नहीं
आरजू बस ये है की उसकी छत पर जा गिरे