लोकप्रिय गीत का अनुपात | Popular song’s ratio

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anup ashesh

7 अप्रैल, यह भावुक कर देने वाला सुख है कि दशकों तक देश की लोकप्रिय हिंदी पत्रिकाओं धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, कादंबिनी, रविवार आदि में अपने नवगीतों से पाठकों को बेसुध कर देने वाले, सतना (म.प्र.) के 75 वर्षीय गीतकवि अनूप अशेष का आज जन्मदिन है। उनके शतायु होने की कामना के साथ ‘कविकुंभ’ की कोटिशः बधाई। ऐसे गीतकवि, जिन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित होकर कई बार लंबी जेल यात्राएँ कीं। उनकी काव्य-कृतियां – लौट आएँगे सगुन, वह मेरे गाँव की हँसी थी, हम अपनी ख़बरों के भीतर, अंधी यात्रा में, मांडवी कथा आदि आज भी सुधी पाठकों में संग्रहित हैं। प्रस्तुत है अतिप्रतिष्ठित कवि का एक सुंदर नवगीत –

‘इतने बरसों बाद भले से
लगते गीले घर।।

गौरैया के पंख भीग कर
निकले पानी से,
कितने गए अषाढ़
देह के
छप्पर-छानी से।
बिटिया के मन में उगते
चिड़ियों के पीले-पर।।

अबके हरे-बाँस फूटें
आँगन शहनाई में,
कितने छूँछे
हर बसंत
बीते परछाई में।

अंकुराई है धान खेत के
सूखे-डीले पर।।

लाज लगे कोई देखे तो
फूटे पीकों-सी,
दूध-भरी
फूटी दोहनी के
खुलते छींकों-सी।
माँ की आँखों में झाँके-दिन
बंधन ढीले कर।।’

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