गौतम बुद्ध की मानवतावादी एवं तर्कवादी विचारधारा को अपनाने में हमारा कल्याण | Our Welfare in adopting Gautam Buddha’s Humanist and Rational Ideology…

0
116

नीरज राठौर –
तथागत् गौतम बुद्ध का जन्म आज से लगभग 2555 वर्ष पहले एक राज परिवार में ऐसे समय हुआ था जहां अपने देश में जाति भेद, हिंसा तथा द्वेष का बोल वाला था। राजघराने में पैदा होने के बावजूद गौतम बुद्ध ने समस्त राजशाही सुखों को त्याग कर मानवतावादी विचार धारा का ज्ञान मार्ग प्रशस्त किया था।

आज भी भारतीय समाज अपने तमाम जीवन मूल्यो में आधुनिकता के बावजूद एक गैर आधुनिक समाज ही माना जाता है। शिक्षित जन भी अतार्किक मूल्यो तथा मानसिक पिछड़ेपन के शिकार है। ऐसी स्थिति मे यह विश्वास करना कठिन होता है कि आज से करीब ढ़ाई हजार वर्ष पहले गौतम बुद्ध ने कहा था ‘ किसी चीज पर इस लिए विश्वास मत करो, कि तुम्हे वैसा बताया गया है, या कि परम्परा से वैसा होता आया है, अथवा स्वयं तुमने उसकी कल्पना की है। तुम्हारा शिक्षक तुम्हे बताये कि उस पर इसलिए विश्वास मत कर लो क्योकि तुम उसका सम्मान करते हो। किन्तु जिस चीज को तुम उचित परीक्षण और विश्लेषण के बाद सभी के लिए हितकर और कल्याणकारी पाओ उस सिद्धान्त पर विश्वास करो और उस पर दृढ़ रहो और उसे अपना मार्ग दर्शक बनाओ।

करीब पाच हजार वर्ष प्राचीन भारतीय चिंतन परम्परा मे एक ओर भौतिक व बुद्धिवादी दूसरी ओर अध्यात्मवाद की धारा मौजूद रही है। इन धाराओ मे आपस में कही समन्वय तो कही अंतर्विरोध भी दिखलाई पड़ता है। इन्ही दोनो के टकराव से भारतीय चिंतन परम्परा भी आगे बढ़ती दिखलाई पड़ती है। एक ओर कपिल कणाद चार्वाक तथा लोकायतो की बुद्धिवादी , भौतिकवादी परम्परा थी दूसरी ओर वेदो और ब्राम्हण ग्रंथों मे वर्णित अध्यात्मवाद की परम्परा थी जिसका प्रतिनिधित्व आदिशंकराचार्य ने किया। गौतम बुद्ध बुद्धवादी ,भौतिकवादी ,विचारधारा के महान दार्शनिक और चिंतक थे। उनका प्रभाव मानव जाति के चिंतन और जीवन पर गहरा पड़ा। विश्व चिंतन और संस्कृति की विरासत मे उनका महत्वपूर्ण स्थान है। क्योकि बौद्धिक प्रमाणिकता नैतिक उत्कृष्टता और अध्यात्मिक अन्र्तदृष्टि की कसौटी पर निःसन्देह वे इतिहास के महान व्यक्तित्व के रूप मे उतरते है। बुद्ध के विचारो का प्राचीन तथा आधुनिक धर्म पर गहरा असर पड़ा है। वे एक ऐसे पहले दार्शनिक थे जिन्होने जीव हत्या सहित हर तरह की हिंसा का विरोध किया। बाद मे इसी अवधारणा को इसाई यहूदी तथा हिन्दू धर्म ने अपनाया।

बुद्ध के उपदेश तथा विचार बौद्ध साहित्य ’त्रिपिटक’ मे संग्रहित है। अनेक बौद्ध विचारक नागार्जुन , अश्वघोष ,धर्मकीर्ती , शान्तिदेव , शान्ति रक्षित ने उनके विचारो के बारे में बहुत कुछ लिखा है तथा इनमें आपस मे बहुत से वाद -विवाद तथा अन्र्तविरोध भी है। इसलिए उनके मूल विचारो को जानने मे कठिनाई होती हे। उनके निर्वाण के पश्चात अनेक राजाओ अशोक , अजातशत्रुं तथा कनिष्क ने इस धर्म को सारे देश के साथ-साथ करीब सारे दक्षिण पूर्व एशिया मे फैला दिया। भारत में तो समय के साथ इसका प्रभाव कम होता गया, लेकिन लंका, वर्मा ,थाईलैण्ड ,चीन ,जापान , कोरिया, मंगोलिया से लेकर , अफगानिस्तान ,इण्डोनेशिया तथा मध्य एशिया के रूसी गणराज्यो तक मे बौद्ध धर्म के अवशेष आज भी प्राप्त होते है। यहा यह धर्म अपने -अपने रूपो मे आज भी मौजूद है। इन देशो के प्राचीन धर्मो के साथ मिलकर इसमे नया रूप ग्रहण कर लिया।

जापान के जेन,ताओ,चीन के कन्फूशियस जैसे धर्मा के साथ इसका मिश्रण हो गया। बुद्ध के विर्वाण के कुछ समय बाद ही बौद्ध धर्म हीनयान , महायान, वज्रयान तीन धाराओ मे बॅट गया। महायान शाखा बुद्ध की मूर्तिया बनाकर उनकी पूजा की जाने लगी। हीनयान में बुद्ध के अवशेषो पर स्तूप बनाकर उसका पूजन होने लगा। वज्रयान मे पुराने तिब्बत के प्राचीन तान्त्रिक धर्म से मिलकर लामावाद तथा अवतारवाद की अवधारणा विकसित हुयी। अनेक देवी देवताओ का पूजन होने लगा जिसके बुद्ध स्वयं घोर विरोधी थे। बुद्ध के मूल विचार बहुत सीधे-साधे थे। उन्होने चार आर्य सत्यो का प्रतिपादन किया-


1-संसार मे दुःख है

2-दुखो का कारण है।

3- दुःखो का निवारण है।

4-दुःखो का निवारण भी इसी दुनिया मे है।

बुद्ध ने वेदो में वर्णित यज्ञ बलि तथा धन सम्पदा की बर्बादी का प्रबल विरोध किया। वे मानते थे कि धन संचय तथा व्यक्तिगत सम्पत्ति मनुष्य के दुखो मूल कारण है। उन्होने अपने अनुयायियो को अध्यात्मिक स्वतंत्रता से कभी वंचित नही किया। उन्हे प्रमाण स्वीकार करके भी सत्य की खोज त्याग नही देनी चाहिए। वे कहते है उन जैसे बनो जिनकी आत्मा प्रकाशित है, उन जेसे बनो जिनकी आत्मा आश्रय स्थल है ,सबसे बड़ी प्रमाणिकता अपने भीतर की आत्मा की आवाज है।’’ बुद्ध के उपदेशो मे हठवादिता नही है। यह बात उस युग अथवा आज के युग मे भी असाधारण है। उन्होने विवादो का गला घोटने से इन्कार कर दिया। वे असहिष्णुता को धर्म का सबसे बड़ा शत्रु मानते थे और अपने शिष्यो को सच्चे ज्ञान तथा सत्य की तलाश स्वयं करने की बात करते थे। ‘आत्म दीपो भव’ की अवधारणा मे यह बात स्पष्ट दिखलाई पड़ती है। मृत्यु के कुछ समय पूर्व अपने प्रिय आनन्द से बुद्ध कहते है, मैने सत्य का प्रचार गुप्त सत्य और प्रगट सत्य का भेद किये बिना किया है। क्योकि सत्य के संबंध मे आनन्द तथा तथागत के पास ऐसा कुछ भी नही है जैसा कोई धर्मगुरू बन्द मुट्ठी मे अपने आप तक सीमित रखे।

आज असहिष्णुता ,हिंसा ,लोभ तथा धार्मिक कट्टरता से भरे सम्पूर्ण विश्व मे बुद्ध के विचारो मे कितनी प्रासंगिकता है यह और बतलाने की आवश्यकता नही है।

गौतम बुद्ध ने तत्कालीन रुढियों और अन्धविश्वासों का खंडन कर एक सहज मानवधर्म की स्थापना की। उन्होंने कहा की जीवन संयम, सत्य और अहिंसा का पालन करते हुए पवित्र और सरल जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कर्म, भाव और ज्ञान के साथ ‘सम्यक्’ की साधना को जोड़ने पर बल दिया, क्योंकि कोई भी ‘अति’ शांति नहीं दे सकती। इसी तरह पीड़ाओ तथा मृत्यु भय से मुक्ति मिल सकती है और भयमुक्ति एवं शांति को ही उन्होंने निर्वाण कहा है।

उन्होंने निर्वाण का जो मार्ग मानव मात्र को सुझाया था,वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व था, मानवता की मुक्ति का मार्ग ढूंढने के लिए उन्होंने स्वयं राजसी भोग विलास त्याग दिया और अनेक प्रकार की शारीरिक यंत्रणाए झेली। गहरे चिंतन – मनन और कठोर साधना के पश्चात् ही उन्हें गया (बिहार) में बोधिवृक्ष के निचे तत्वज्ञान प्राप्त हुआ था। और उन्होंने सर्व प्रथम पांच शिष्यों को दिक्षा दी थी। तत्पश्चात अनेक प्रतापी राजा भी उनके अनुयायी बन गये।उंका धर्म भारत के बाहर भी तेजी से फैला और आज भी बौद्ध धर्म चीन, जपान आदि कई देशों का प्रधान धर्म है।
गौतम बुद्ध की विचारधारा को अपना कर समाज में उत्पन्न खाई को पाटा जा सकता है ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here