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यही है इंदौर होने का मतलब

Posted on: 07 Mar 2019 19:24 by Rakesh Saini
यही है इंदौर होने का मतलब

अमित मंडलोई

इंदौर को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं तो शब्द ढूंढना मुश्किल हो जाता है। एक शहर को जीने और महसूस करने के कई तरीके हो सकते हैं, लेकिन अभिव्यक्त करने की बारी आती है तो इंदौर के लिए भी नेति-नेति जैसे शब्द निकलते हैं। हर बार यह अपने आपको शब्दों के परकोटे से बाहर खड़ा कर लेता है। हम उससे एक बात सीखते हैं और वह 10 ऐसी मिसाल खड़ी कर देता है कि आश्चर्य और गर्व करने के अलावा कुछ बाकी नहीं रहता।

वास्तव में इंदौर जमीन के टुकड़े की किसी बसाहट का नाम नहीं है। वह एक संस्कृति, संस्कार, आचार-विचार और जीवनशैली का मिश्रण है, जिसमें लडऩे का माद्दा है, हासिल करने का जुनून है और तमाम प्राप्तियों को सबके साथ साझा करने की संवेदनाएं हैं। सुख-दु:ख की हर घड़ी में इंदौर हमेशा एक-दूसरे के साथ हाथ मिलाए खड़ा नजर आता है। घरों के बीच दीवारें भले खड़ी हैं, लेकिन दिलों के बीच कोई बाधा नहीं है।

ठिठुरती ठंड में आधी रात को लोग फुटपाथ पर सोए लोगों को कंबल ओढ़ाने पहुंच जाते हैं। अस्पतालों में बिना नाम-पता बताए मरीजों को दवाई, उनके परिजन के लिए भोजन आदि का इंतजाम करते हैं। एक दुर्घटना होती है तो पूरा शहर खून देने के लिए लाइन लगाकर खड़ा हो जाता है। किसी बेटी के साथ दुव्र्यवहार होता है तो उबल पड़ता है। सडक़ों पर उतर आता है। हमारे जश्न, व्रत-त्योहार, उत्सव, संवदेनाएं, प्यार, अपनापन, जुनून, शर्म, गुस्सा, घृणा सब साझा है। यही हमारी विरासत और यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

यही हमें दुनिया के हर शहर से अलग और बेहतर बनाता है। वरना कोई वजह नहीं दिखती कि देश के 4237 शहर प्राणपण से भिडक़र भी लगातार तीन साल तक हमारा मुकाबला न कर पाएं। आज ठिठक कर देखते हैं तो पता चलता है कहां थे हम। सूची में कितने पीछे, जिक्र करने में भी शर्म आती थी। लेकिन हमने शर्म का लबादा ओढक़र उसके पीछे मुंह छुपाने की कोशिश नहीं की।

कुदाल थामी, फावड़े उठाए, तगारियां हाथ में लीं, झाडू पकड़ कर सडक़ों पर आ गए। मैसूर ने दो बार किला लड़ाया, लेकिन अफसरों के इधर-उधर होने से व्यवस्था डगमगा गई। ताज गंवा दिया, लेकिन इंदौर… इंदौर ही रहा। एक बार माथे पर सिरमौर का ताज पहना तो पीछे मुडक़र नहीं देखा। हर बार चुनौती बढ़ती गई। बड़ी होती गई, लेकिन हमारा हौंसला नहीं डिगा। हम दोगुना ताकत से जुट गए। अफसरों के तबादले हुए, व्यवस्था बदली, प्रदेश का नेतृत्व बदला, मगर इंदौर नहीं बदला।

लोकमान्य नगर भगिनी मंडल, परमाणु नगर जैसे उदाहरण गली-गली का किस्सा बन गए। सारे बाजार सराफा और 56 दुकान हो गए, जहां हजारों लोग स्वाद का जश्न मनाने आते हैं, लेकिन लेशमात्र भी गंदगी नहीं छोड़ते। हम सडक़ों पर जुलूस निकालते हैं, लेकिन पीछे झाडू लेकर चलते हैं। यहां तक कि अंतिम यात्रा के बाद भी चंद मिनटों में सफाई कर दी जाती है।

दुनिया के लिए रात आराम के लिए होती है और इंदौर के लिए देर रात को ही सफाई का जश्न शुरू होता है। यह इंदौर ही है जहां घरों का कचरा घर में ही खत्म होने लगा है, ट्रेंचिंग ग्राउंड बदबू के पहाड़ से पर्यटन स्थल में बदल चुका है। मंदिर सफाई के भी तीर्थ बन गए और कचरा शहर की कमाई का जरिया बन गया।

इन्हीं सामूहिक कोशिशों का नतीजा है कि सफाई का इंदौर मॉडल पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन चुका है। इंदौर का नंबर वन होना, इंदौर और इंदौरियत की जीत है। इस अवसर पर यही दुआ निकलती है कि शहर का यह जज्बाभर कायम रहे, दुनिया के तमाम लक्ष्य हमारे आगे बौने हैं। सफाई में देश की पहली हैट्रिक मुबारक हो मेरे इंदौर..

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फेसबुक वॉल से साभार।

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