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महात्‍मा बुद्ध की तरह तेजस्‍वी और महामानव थे राहुल सांकृत्‍यायन | Like the Mahatma Buddha, the stunning and the great man was Rahul Sankrityayan

Posted on: 09 Apr 2019 16:25 by Mohit Devkar
महात्‍मा बुद्ध की तरह तेजस्‍वी और महामानव थे राहुल सांकृत्‍यायन | Like the Mahatma Buddha, the stunning and the great man was Rahul Sankrityayan

नीरज राठौर की कलम से

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की जयंती आज 9 अप्रैल को है। उनकी हर रचना अनमोल है, आज यह किसी प्रमाण की मोहताज नहीं। पंडित जी घुम्मकड़ी को अपना धर्म मानते थे। देश-विदेश समेत कई दुर्लभ स्थानों का भ्रमण किए। हजारों किमी दूर पहाड़ों और नदियों के बीच भटकने के बाद ज्ञान की जहां सामग्री हाथ लगी उसे लाने में हिचके नहीं। इतना ही नहीं उन ग्रंथों को खच्चरों पर लादकर स्वदेश लाए। यह घटना अब के वैज्ञानिक युग के लिए भी अविस्मरणीय है। बौद्ध धर्म पर युगांतकारी शोध करने वाले राहुल के ज्ञान के सागर में डुबकी लगा रहे हैं।

महान घुमक्कड़, प्रकांड पंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा ग्राम में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था. बचपन में ही माता कुलवन्ती देवी तथा पिता गोवर्धन पांडेय की असामयिक मृत्यु के चलते वह ननिहाल में पले बढ़े. उनकी शुरुआती शिक्षा उर्दू में हुई. 15 साल की उम्र में उर्दू माध्यम से मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण कर वह आजमगढ़ से काशी आ गए. यहां उन्होंने संस्कृत और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया और वेदान्त के अध्ययन के लिए अयोध्या पहुंच गए. अरबी की पढ़ाई के लिए वह आगरा गए तो फारसी की पढ़ाई के लिए लाहौर की यात्रा की.

अपनी रचना मध्य एशिया के इतिहास के लिए 1958 में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा सृजन के क्षेत्र में 1963 में पद्मभूषण से नवाजे गए राहुल के विषय में कबीरदास की यह रचना ‘पोथी पढि़-पढि़ जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’, बिल्कुल सटीक बैठती है। जीने के क्रम में उन्हें जो अनुभव मिला तथा उन्होंने जो सुना व देखा तथा महसूस किया, उसे वे अपने भीतर समाहित करते चले गए। इस प्रकार औपचारिक शिक्षा प्राप्त न करने के बावजूद भी जीवन ने उन्हें पंडित ही नहीं महापंडित बना दिया।

उनकी रचनाओं में समाज, देश के बारे में बहुत विस्‍तार से लिखा हुआ होता है।’ लेखन में इतना विस्‍तार समाज, सभ्‍यता-संस्‍कृति, आम लोगों पर उनके सूक्ष्‍म अवलोकन के कारण आता था। उनके लेखन के मुरीद एक बुजुर्ग पाठक श्रीहरि चौहान बताते हैं कि मुझे याद है कि ‘किन्नर देश में’ किताब लिखने से पहले उन्‍होंने हिमाचल प्रदेश में तिब्बत सीमा पर कभी बस और घोड़े के सहारे, तो कभी कई बार उन्‍होंने पैदल भी यात्राएं की थीं। तभी तो उनकी यह किताब श्रेष्‍ठ यात्रा वृत्‍तांतों में से एक बन गई। कथाकार काशीनाथ सिंह उन्‍हें याद करते हुए कहते हैं, ‘मैंने राहुल जी को कई बार देखा। उन्‍हें सुनने का अवसर भी मुझे मिला था। 68 में वे काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ का उद्धाटन करने आए थे। वे छोटा कुर्ता-पाजामा पहने हुए थे।
पहनावे से तो वे साधारण किसान समान लग रहे थे, लेकिन उनके मुखमंडल पर काफी तेज था। ऐसा प्रतीत होता था कि साक्षात महात्‍मा बुद्ध खड़े हों। जैसा कि कुछ लेखकों ने उनके बारे में लिखा भी है। उनका व्‍यक्तित्‍व बहुत आकर्षक और भव्‍य था, जबकि वे मधुमेह पीडि़त भी हो गए थे।’ काशीनाथ सिंह दावा करते हैं कि उनकी जानकारी में राहुल जी इतना ज्ञानसंपन्‍न, भाषाविद और बड़ी संख्‍या में ग्रंथों को रचने वाला लेखक कोई दूसरा हिंदी में नहीं है। ‘मेरी जीवन यात्रा(आत्‍मकथा)’, ‘वोल्‍गा से गंगा’ और ‘कनैला की कथा’ उनकी सर्वोत्‍तम कृति हैं। राहुल जी लगभग 35 भाषाओं में लिख-पढ़ सकते थे।
असगर वजाहत कहते हैं कि उन्‍हें सिर्फ पर्यटक नहीं, बल्कि सोशल टूरिस्‍ट कहा जा सकता है, क्‍योंकि समाज से जुड़ा हुआ वे पर्यटन किया करते थे। उन्‍होंने जितनी भी यात्राएं की हैं, उन्‍हें भारत की सांस्‍कृतिक यात्राएं कहना ज्‍यादा मुफीद होग। उन्‍होंने लेखन के जरिए प्राचीन ग्रंथों को खोजा और अनुवाद के जरिये उन्‍हें आम लोगों के सामने लाया। असल में वे सिर्फ विद्वान ही नहीं, बल्कि एक तरह से सामाजिक और सांस्‍कृतिक कार्यकर्ता भी थे।
अपने जीवनकाल में 50 हजार से अधिक पन्ने लिखने वाले राहुल सांकृत्यायन ने अपने घुमक्कड़ी जीवन में कितने लाख किलोमीटर की यात्रा की, कितने हजार किलोमीटर वे पैदल ही चले, इसका किसी को पता नहीं है. प्रसिद्ध पुस्तक ‘मध्य एशिया का इतिहास’ की रचना के लिए राहुल सांकृत्यायन किस तरह से 200 से अधिक किलो वजन की किताबें सोवियत संघ से साथ ढोकर भारत लाए उससे उनकी रचनाप्रक्रिया के पीछे की अदम्य साधना को भी समझना होगा.

वोल्गा से गंगा लिखने से पहले राहुल सांकृत्यायन ने भारत के 8 हजार वर्षों के इतिहास को अपनी आंखों से देखा, फिर दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया. प्रभाकर माचवे के अनुसार, ‘वोल्गा से गंगा’ प्रागैतिहासिक और एतिहासिक ललित कथा संग्रह की अनोखी कृति है. हिंदी साहित्य में विशाल आयाम के साथ लिखी गई यह पहली कृति है. महाप्राण निराला के शब्दों में- ‘हिंदी के हित का अभिमान वह, दान वह.’

विश्व के कई सम्मानित भाषाविद मानते हैं कि राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी के साथ-साथ भारत की सबसे प्राचीन भाषा पाली और संस्कृत को दुनिया में इस तरह प्रतिष्ठित कराया कि आज पाली और संस्कृत के सबसे बड़े अध्येता भारत की बजाय, यूरोपीय देशों के निवासी हैं. जर्मनी के प्रसिद्ध अध्येता अर्नस्ट स्टेनकेलेनर ने राहुल सांकृत्यायन के प्रभाव में पालि, संस्कृत और तिब्बती पर अपनी दक्षता कायम की. स्टेनकेलेनर ने तिब्बती पाण्डुलिपियों पर गहन शोध किया है, जिसे नीदरलैंड रॉयल अकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साइंस ने 2004 में प्रकशित किया है. स्टेनकेलेनर के अनुसार भारत से बाहर के शोध संस्थानों में राहुल सांकृत्यायन को जो स्थान प्राप्त है, वह किसी भारतीय राजनेता के लिए भी मुमकिन नहीं है.

राहुल सांकृत्यायन का हृदय बहुत बड़ा था. वे व्यक्ति में दोष की बजाय गुण देखने पर बल देते थे. उनका मत था कि कोई भी व्यक्ति दूध का धुला नहीं होता. यदि किसी भी व्यक्ति में पांच प्रतिशत भी अच्छाई है, तो उसे महत्त्व देना चाहिए. घुमक्कड़ पंथ के महान समर्थक सांकृत्यायन 1959 में दर्शनशास्त्र के महाचार्य के नाते एक बार फिर श्रीलंका गए; पर 1961 में उनकी स्मृति खो गई. इसी दशा में 14 अप्रैल, 1963 को उनका देहांत हो गया.

यह बेहद दुखद है कि केदार पाण्डेय को जिस बिहार के खेत-खलिहानों, किसानों के संघर्ष और जेलों ने सभ्यता का महान यायावर, ज्ञानी महापंडित राहुल सांकृत्यायन बनाया, और जिन्होंने प्रतिदान स्वरूप उस धरती को अपनी यायावरी से अर्जित सबसे बड़ी थाती हजारों तिब्बती पांडुलिपी, पुरातत्व और थंका चित्र प्रदान कर दिया, उसने उसे वह मान नहीं दिया, जिसका वे हकदार थे. बिहार सरकार, भारत सरकार और पटना संग्रहालय आज भी उसके संपूर्ण अध्ययन में अक्षम साबित हुआ है.
आज उनकी जयंती है।

शत शत नमन

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