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ना तालियों की कमी थी ना भावनाओं की

Posted on: 05 Mar 2019 18:44 by Rakesh Saini
ना तालियों की कमी थी ना भावनाओं की

मुकेश तिवारी

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ना तालियों की कोई कमी थी और ना भावनाओं की। मंच पर कुछ साहित्यकारों की आंखों में आंसू थे और सभागृह में मौजूद कई लोग भी भीग गई अपनी आंखों को बार-बार पोछते नजर आ रहे थे।

अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम के आखिरी दिन मंगलवार की दोपहर जो आखिरी सत्र हुआ वह बेहद भावुक था। ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्योंकि बचपन से दिव्यांग एक कलमकार बेटी को सम्मानित किये जाने की यह घड़ी थी। प्रातः स्मरणीय देवी अहिल्या बाई के नाम से पहला अहिल्या शक्ति सम्मान देवास की जिस ऋचा कर्पे को दिया गया वह अपने व्यक्तिगत अनुभव और प्रकृति को विषय बना कर ना केवल कविताएं रचती है बल्कि लघु कथाओं को आकार भी देती है। तमाम विपरीत शारीरिक परिस्थितियों के बावजूद साहित्य सृजन में लगी ऋचा अचला नागर और सुधा अरोड़ा जैसी बड़ी साहित्यकार के हाथों सम्मानित होने के वक्त बेहद खुश नजर आई।

Akhil Bharatiya Mahila Sahitya Samagam

सम्मान ग्रहण करने से पहले मुझसे चर्चा में उसने कहा, अभी बहुत आगे जाना है। बहुत कुछ करना है साहित्य के क्षेत्र में। यह सम्मान मुझे और हौसला देगा। आप लोगों ने मुझे सम्मानित करके साहित्य के प्रति मेरे उत्तर दायित्व को बढ़ा दिया है। पिता दीपक कर्पे से प्रेरणा पाकर साहित्य के क्षेत्र में कदम रखने वाली यह बेटी अब हिंदी की उच्च शिक्षा ग्रहण करना चाहती है। बार-बार कहती है अभी आगे और बहुत कुछ करना है। उसकी लगन और हौंसला बताता है कि एक दिन वह साहित्य के क्षेत्र में खूब नाम कमाएगी।

लेखक घमासान डॉट कॉम के संपादक हैं

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