देशमध्य प्रदेश

अग्रज एवं अनुज को प्रणाम

सन्तोष सिंह

हमने ईद को पहली बार हामिद की नज़रों से देखा और महसूस किया था। जी हाँ, वही चार-पाँच साल का गरीब यतीम बच्चा, जो अपनी बूढ़ी दादी अमीना संग रहता था। वैसे हमारी ईद की पहली समझ का सारा श्रेय मुंशी प्रेमचंद जी को जाता है, जिन्होंने ईदगाह के चरित्रों और उस ईद के एक दिन को अपनी भावनाओं और शब्दों में बांध कर ला-जवाल कर दिया। वो तीन पैसे का चिमटा जिसमें इतनी ताक़त थी की कुछ पलों के लिए बच्चा हामिद बूढ़ा और बूढ़ी अमीन बच्ची बन गयीं।

मेरी उमर उस समय क्या रही होगी ये तो याद नहीं, ना ही उस समय ये समझ आया की मुंशी प्रेमचंद जी कौन हैं। समझ आया तो बस इतना की एक गरीब बच्चे ने अपने तीन पैसे से एक ऐसी ईद मनायी जो की एक मिसाल बन गयी। कैसे एक बच्चा मिठाइयों और खिलौनों के उत्साह में तीन कोस पैदल चल कर, नहीं नहीं उड़ कर मेला देखने गया। कैसे वो एक बच्चा खुद से जिरह कर अपने सपनों को अपने ही हाथों से तोड़कर एक हक़ीक़त से रूबरू हुआ। नमाज़ का भी पहला इल्म हमें मुंशी प्रेमचंद जी ने ही कराया था। उनके शब्दों में एक ऐसी ताक़त है की आज भी उनकी कहानियों को पढ़ते वक्त उनके सारे किरदार अपने आसपास ही महसूस करने लगता हूँ।

मुद्दे की बात ये की जब ईद से पहली पर रूबरू हुए तो बहुत ही छोटे थे। बस इतना समझ आया की ईद के दिन नमाज़ पढ़ते हैं, नए नए कपड़े पहनते हैं, लोगों से गले मिलते हैं, ईद की मुबारकबाद देते हैं, मेला घूमने जाते हैं, खिलौने और मिठाइयाँ ख़रीदते हैं। जैसे जैसे बड़े हुए, समझ भी बड़ी होती गयी। जैसे जैसे मित्र बढ़ते गए, वैसे वैसे मित्रों के साथ मेल-जोल भी बढ़ता गया। उस समय एक उमर तक मित्रों के घर आने जाने की बड़ी मनाही हुआ करती थी। ना तो फ़ोन होते थे और ना ही मोबाइल, तो हमारी मित्रता बस विद्यालय तक ही सीमित रहती थी।

दोस्तों को ईद की मुबारकबाद तो दिया करते थे, लेकिन ये मुबारकबाद या तो ईद के एक दिन पहले होती थी या फिर ईद के एक दिन बाद क्योंकि ईद के दिन तो छुट्टी का दिन था। हमारा ईद का कुल तीन कारणों से बड़ा ख़ास होता था। एक तो उस दिन घर पर सिंवई बनना ज़रूरी था, दूसरा शाम को पिताजी के साथ घूमने जाने को मिलता था और तीसरा उस दिन विद्यालय की छुट्टी होती थी।

जैसे जैसे बड़े होते गए, वैसे वैसे मित्रों के घर आना जाना भी शुरू हो गया। बस फिर क्या था, ईद मनाने के पहलू में भी बदलाव आये। अब हम अपने मित्रों के घर भी जाते और भरपेट सिंवईया भी उड़ाते। वक्त के साथ-साथ व्यस्तता भी बढ़ती गयी और वक्त भी बदलता गया। कुछ चुनिंदा मित्र ऐसे रहे जिनसे पूरे साल ना ही मिलना जुलना होता और ना ही बातचीत। लेकिन ईद का दिन एक ऐसा दिन होता, जिस दिन मिलना तय था और इसमें कभी भी चूक ना हुई। कम से कम तब तक जब तक हम इलाहाबाद में रहे। आज भी इलाहाबाद की वो ईद और उन दोस्तों के घर से मिली ईदी की कमी खलती है।

ईद तो हम आज भी मनाते हैं, सिंवईया तो हम आज भी उड़ाते हैं। लेकिन वो इलाहाबाद की इलाहाबादी ईद इलाहाबादी दोस्तों संग बड़ी शिद्दत से याद करते हैं।

यक़ीन मानिए ये एक एतेहासिक ईद है। कहीं ना कहीं कोई मुंशी प्रेमचंद आज इस ईद को अपने भावों और शब्दों में बांध कर ला-जवाल करने का पूरा इंतेजाम कर रहे होंगे। हमारी आने वाली पीढ़ियाँ आज की इस ईद को एक नए रंग और एक नए ज़ायके की तर्ज़ पर जानेंगी, समझेंगी, चखेंगी और मनाएँगी।

बस इन्हीं यादों और उम्मीदों के साथ आप सभी को ईद की मुबारकबाद।