भोजशाला में रखी मां सरस्वती की मूर्ति कैसे पहुंची लंदन? जानें पूरी सच्चाई

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By Raj RathorePublished On: May 15, 2026
Bhojshala History

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए हिंदू पक्ष की दलीलों को स्वीकार किया है। कोर्ट ने ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर भोजशाला को मां वाग्देवी से जुड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल माना, जबकि मुस्लिम पक्ष की कई आपत्तियों को खारिज कर दिया।

इस फैसले के बाद अब उस ऐतिहासिक प्रतिमा की चर्चा भी तेज हो गई है, जिसे मां वाग्देवी या ‘सरस्वती ऑफ धार’ के नाम से जाना जाता है और जो वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है।

राजा भोज ने की थी स्थापित

इतिहास के अनुसार, 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज ने धार में सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय यानी भोजशाला का निर्माण कराया था। वर्ष 1034 ईस्वी के आसपास बने इस विद्या केंद्र में मां सरस्वती की एक अत्यंत दुर्लभ और कलात्मक प्रतिमा स्थापित की गई थी।

यह प्रतिमा ज्ञान, विद्या और शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी। कहा जाता है कि भोजशाला उस दौर में संस्कृत शिक्षा और वैदिक अध्ययन का प्रमुख केंद्र थी, जहां वेद मंत्रों और शास्त्रार्थ की परंपरा जीवित थी।

खंडहर में बदल गई भोजशाला

समय के साथ कई आक्रमणों में भोजशाला को भारी नुकसान पहुंचा। इतिहासकारों के मुताबिक मुगल काल और उसके बाद के दौर में इस परिसर को तोड़ा गया और धीरे-धीरे यह खंडहर में बदल गया। इसी दौरान मां वाग्देवी की प्रतिमा भी मलबे के नीचे दब गई।

खुदाई में मिली और अंग्रेज ले गए लंदन

इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1875 में धार के तत्कालीन राजनीतिक एजेंट मेजर जनरल विलियम किनकैड को खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मिली थी। किनकैड को प्राचीन कलाकृतियों में विशेष रुचि थी।

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय धरोहरों पर अंग्रेज अधिकारियों का नियंत्रण था। इसी बीच 1886 से 1891 के बीच यह प्रतिमा भारत से इंग्लैंड पहुंचा दी गई। तब से यह प्रतिमा ब्रिटिश म्यूजियम में ‘Saraswati of Dhar’ नाम से प्रदर्शित की जा रही है।

भारतीय पुरातत्वविदों का मानना है कि यह प्रतिमा परमारकालीन शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण है और इसे भारत से बाहर ले जाना सांस्कृतिक विरासत की बड़ी क्षति माना जाता है।

केंद्र सरकार को दिया विचार का संकेत

भोजशाला मामले में आए ताजा फैसले में हाईकोर्ट ने उन प्रतिवेदनों का भी उल्लेख किया, जिनमें मां वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन से वापस भारत लाने की मांग की गई थी।याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में तर्क दिया कि जिस तरह भारत सरकार ने हाल के वर्षों में विदेशों से कई प्राचीन मूर्तियां और धार्मिक धरोहरें वापस मंगाई हैं, उसी तरह मां वाग्देवी की प्रतिमा को भी उसके मूल स्थान पर लाया जाना चाहिए।

हिंदू पक्ष का कहना था कि जब तक अधिष्ठात्री देवी अपने मूल मंदिर में स्थापित नहीं होतीं, तब तक भोजशाला का पुनर्स्थापन अधूरा माना जाएगा। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारत सरकार इस मांग पर कानून और कूटनीतिक प्रक्रिया के दायरे में रहकर विचार कर सकती है। फैसले के बाद अब मां वाग्देवी की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग फिर तेज हो गई है।