मध्य प्रदेश में पेयजल के प्रमुख स्रोत मानी जाने वाली नदियां और भूजल अब गंभीर प्रदूषण की चपेट में हैं। इंदौर में दूषित पानी से 17 लोगों की मौत के बाद राज्य में जल गुणवत्ता को लेकर सवाल और गहरे हो गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की 211 नदियां और 353 भूजल स्रोत दूषित पाए गए हैं, जिससे आमजन की सेहत पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। उद्योगों से निकलने वाला रसायनयुक्त पानी सीधे जल स्रोतों में पहुंचकर स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
प्रदेश में कुल 2,515 रेड श्रेणी के उद्योग ऐसे हैं जो सबसे अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। इन उद्योगों द्वारा अपशिष्ट जल के उपचार की व्यवस्था नहीं की गई, जिससे जहरीला पानी नदियों और जलाशयों में छोड़ा जा रहा है। इसके अलावा 5,961 उद्योगों ने अनिवार्य समेकित सहमति और प्राधिकरण (सीसीए) का नवीनीकरण भी नहीं कराया है। नियमों की अनदेखी से न केवल जल प्रदूषण बढ़ा है, बल्कि नदियों का प्राकृतिक इको सिस्टम भी लगातार कमजोर हो रहा है।
राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के तहत राज्य में 211 नदियां, 20 झीलें, 11 तालाब, एक टैंक, आठ जलाशय और 353 भूजल स्रोत दूषित चिह्नित किए गए हैं। वहीं अमृत 2.0 योजना के तहत सात हजार अमृत मित्र जल गुणवत्ता परीक्षण में लगे हुए हैं और करोड़ों रुपये का बजट भी स्वीकृत किया गया है, इसके बावजूद प्रदेश की 305 नदियां, तालाब और जलाशय प्रदूषण से जूझ रहे हैं। इससे योजनाओं की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि रेड श्रेणी के उद्योगों की नियमित निगरानी की जाती है और अधिक प्रदूषण फैलाने वालों को नोटिस देकर कार्रवाई भी होती है। कुछ उद्योगों में रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए गए हैं, लेकिन कई इकाइयां अब भी नियमों का पालन नहीं कर रहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सख्त नियंत्रण और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले समय में राज्य में जल संकट और गहराता चला जाएगा।









