इंदौर में दूषित पानी की आपूर्ति से हुई 20 मौतों ने शहरी व्यवस्था की उस सच्चाई को सामने ला दिया है, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा था। देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिने जाने वाले इंदौर में मल-मूत्र मिले पानी का घरों तक पहुंचना न सिर्फ स्थानीय प्रशासन, बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह घटना बताती है कि शुद्ध पानी और साफ हवा जैसे बुनियादी अधिकार अब महानगरों में धीरे-धीरे विलासिता बनते जा रहे हैं।
देश की राजधानी दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में हालात अलग नहीं हैं। पुरानी और जर्जर पाइपलाइनें, अवैध कनेक्शन, पानी माफिया और भूजल में यूरेनियम जैसे खतरों ने नागरिकों को सरकारी व्यवस्था से दूर कर दिया है। मजबूरी में लोग आरओ और बोतलबंद पानी पर निर्भर हो गए हैं। सरकारी दावों और योजनाओं के बावजूद, शहरी आबादी आज भी सुरक्षित पानी और स्वच्छ वातावरण के लिए संघर्ष कर रही है।
हर घर की मजबूरी बने उपकरण
आज स्थिति यह है कि आरओ, एयर कंडीशनर और एयर प्यूरीफायर जैसे उपकरण अब सुविधा नहीं, बल्कि जरूरत बन चुके हैं। मध्यम वर्गीय परिवार भी इनके बिना जीवन की कल्पना करने से डरता है। खराब पानी से बचने के लिए आरओ जरूरी है, तो प्रदूषित हवा और बढ़ते तापमान के कारण एसी और एयर प्यूरीफायर अनिवार्य हो गए हैं। यह निर्भरता बताती है कि बुनियादी सेवाओं की जिम्मेदारी धीरे-धीरे सरकार से खिसककर नागरिकों के कंधों पर आ गई है।
इंदौर की घटना ने देश को झकझोरा
इंदौर की त्रासदी ने सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। भोपाल, उज्जैन और जबलपुर जैसे शहरों में जांच के दौरान सामने आई बदहाली ने दिखा दिया कि हालात कहीं भी संतोषजनक नहीं हैं। भागीरथपुरा की घटना को महामारी घोषित किया जाना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। सवाल यह है कि आखिर कब जिम्मेदार चेतेंगे और शुद्ध हवा व साफ पानी जैसे मूल अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए ठोस, सालभर चलने वाली कार्ययोजना और जवाबदेही तय होगी।










