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निर्वाणोत्सव : खुद पर विजय पाना ही महावीर होना

Posted on: 06 Nov 2018 08:48 by Ravindra Singh Rana
निर्वाणोत्सव : खुद पर विजय पाना ही महावीर होना

– शोभा जैन
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दीपावली (कार्तिक अमावस्या) को जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर को उनके कठोर तप से मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। सुबह स्वाति नक्षत्र के दौरान महावीरजी सांसारिक जीवन से मुक्त होकर मोक्षधाम को प्राप्त हो गए थे। इसी दिन उनके प्रमुख शिष्य गौतम गणधर को संध्या के समय परम बोधि कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान ज्योति का प्रतीक है जो स्वयं भी प्रकाशित होता है और दूसरों को भी प्रकाशित करता है। उसी के प्रतीक स्वरूप दीपावली पर्व मनाया जाता है। इसी उपलक्ष्य में जैन धर्म में दीपमालिका सजाकर भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव मनाया जाता और कई जैन मंदिरों में निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है।

लड्डू गोल होता है, जिसका अर्थ होता है जिसका न आरंभ है न अंत है। जैन पुराणों में निर्वाण लड्डू के संदर्भ में व्याख्या है– ‘’लड्डू का तपना और पकने का अर्थ है,अखंड आत्मा को भी तपश्चरण की आग में तपना और उसके पश्चात् मोक्षरूपी चाशनी की मधुरता का मिलना |’’ भगवान महावीर से कृपा-प्रसाद प्राप्ति हेतु लड्डुओं का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। भगवान महावीर स्वामी ने कैवल्य प्राप्ति की धारा को सुव्यवस्थित करते हुए मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति उन सभी जीव के अस्तित्व को स्वीकारते हुए ‘अहिंसा’ को परम धर्म माना और इसे आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया |

उनके सिद्धांत या संदेश किसी खास कौम या धर्म के लिए नहीं हैं बल्कि समस्त संसार के लिए रहे हैं।उनका ‘सह-अस्तित्व का सिद्धांत ‘’जिओ और जीने दो‘’ अपना अस्तित्व खोते हिंसक समाज के लिए जीव सार है | समाज जैसी बड़ी वैचारिक संस्था के लिए उनका कथन है— ‘’एक-दूसरे से जुड़ाव के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती |’’ भगवान महावीर स्वामी का सम्पूर्ण जीवन ही सत्य, अहिंसा और मानवता का संदेश है।

वे बिना किसी पर अपने विचार थोपे मानवता और पर्यावरण के महाविनाश से बचाव के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे | उन्होंने मानवता को जीवित बनाये रखने के लिए ‘क्षमा’ के महत्व को गहनता से प्रतिपादित किया और इसका विस्तार भी किया | बदलते सामाजिक सन्दर्भों में भगवान महावीर स्वामी के सन्देश सभी के लिए सार्थक है क्योंकि सम्पूर्ण मनुष्य जाति एक ही है | जिसमें सभी का अस्तित्व स्वीकार्य है इसलिए सत्य की राह पर चलकर ‘अहिंसा परमो धर्मः’ को आत्मसात करना ही समाज में सुख शांति और जीवन की सार्थकता दे सकता है । अमावस्या की अँधेरी रात में भगवान महावीर ने आत्मज्ञान की ज्योति जलाकर सारे जगत को रोशन कर दिया। हमें इसे सहेजते हुए इस प्रकाश का विस्तार कर वर्तमान के वीभत्स रूप पर पुनरावलोकन करना चाहिए | हम मानव को जीवन के शुष्क नीरस बोझमयी मन के अंधेरों से बाहर लाने का प्रयास करें जिससे एक स्वस्थ समाज की रचना सार्थक हो | प्रेम और साधना से स्वयं पर विजय प्राप्त करना हमारा ध्येय हो और स्वयं पर विजय पाने वाला ही महावीर होता है |

shobha-jain

– लेखिका,समीक्षक

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