प्रवासी भारतीय सम्मेलन (Pravasi bharatiya sammelan) और ग्लोबल इन्वेस्टर सम्मिट (Global Investors summit) से किसी को कुछ मिला हो या ना मिला हो, लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो फायदे में ही रहे। पांच दिन के इन दोनों आयोजनों में शिवराज पूरी तरह छाए रहे और उन्होंने मौके को भुनाने में कोई भी कसर बाकी नहीं रखी। जो भी प्लेटफार्म उन्हें मिला उस पर चाहे राष्ट्रपति मौजूद रही हों, या प्रधानमंत्री शिवराज अपने अंदाज में ही बोले और खूब दाद बटोरी। चाहे मध्यप्रदेश को सबसे आगे बताने का मामला हो या फिर माफी मांगने का। अब कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि यह सियासत की मेहफिल नहीं, कार्पोरेट सेक्टर का जमावड़ा था और यहां उनका कुछ अलग अंदाज सामने आना था। पर शिवराज तो शिवराज हैं, उन्हें जो भाता है, वही जुबां पर आ जाता है।

सियासत, सेक्स और सीडी

मध्यप्रदेश में इन दिनों फिर एक सीडी की बड़ी चर्चा है। सियासत और सेक्स से जुड़ी यह सीडी कइयों का राजनीतिक भविष्य बिगाड़ सकती है। सीडी का जुमला नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह सामने लाए। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ ने जो कुछ कहा उससे गोविंद सिंह की बात को वजन मिला। गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने एक अलग ही राग छेड़ा और भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा इस मामले में नेता प्रतिपक्ष को ही चुनौती दे बैठे। इस सबके बीच कमलनाथ अचानक बैकफुट पर आ गए और बोले, मेरे पास तो सीडी नहीं है, हां, जब मैं मुख्यमंत्री था, तब अफसरों ने मुझे ऐसी सीडी की जानकारी तो दी थी। फिलहाल तो सीडी की इस चर्चा ने कइयों की धड़कने बढ़ा रखी हैं।

सिंधिया के महल में ‘पाराशर पुराण’

15 साल तक ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ साये की तरह रहे पुरुषोत्तम पाराशर का यूं सिंधिया हाउस को बाय-बाय कर देना किसी को समझ नहीं आ रहा है। इस घटनाक्रम ने सिर्फ सिंधिया खेमे और भाजपा के तमाम गुटों में हलचल मचाई, बल्कि कांग्रेस भी उसमें नजर गड़ाए हुए हैं। 15 दिन से दफ्तर नहीं आ रहे पाराशर ने नए साल के दूसरे दिन इस्तीफा दे दिया। उन्होंने खुद इसकी जानकारी सिंधिया समर्थकों को वाट्सएप के माध्यम से दी। अब कोई कह रहा संघ के दबाव में हटाया गया, कोई कह रहा है कि उनके खिलाफ शिकायत मिल रही थी।

लेकिन जिन लोगों को पाराशर की हैसियत और महत्व का अंदाजा है, उनके गले ये बातें उतर नहीं रही हैं। इस बदलाव में तड़का दिग्विजय सिंह के उस ट्वीट ने लगा दिया है कि क्या महाराज अपने सबसे विश्वस्त को भी नहीं बचा पाए। वैसे जिन लोगों ने 2010 के पीसीए के प्रतिष्ठा को चुनाव से लेकर कांग्रेस के विधायकों को बेंगलुरु ले जाने तक की घटनाएं देखी है उन्हें पता है कि पाराशर का राजनीतिक प्रबंधन और टीम सिंधिया में उनकी पकड़ कितनी है।

दिल्ली में रुक गई कमलनाथ की सूची

सामान्यत: यह माना जाता है कि कमलनाथ जैसा चाहते हैं, मध्यप्रदेश कांग्रेस में वैसा ही हो जाता है। लेकिन इस बार ऐसा हो नहीं पा रहा है। प्रदेश के डेढ़ दर्जन से ज्यादा जिलों के शहर और जिला अध्यक्ष बदले जाने का कमलनाथ का प्रस्ताव दिल्ली वालों ने अटका दिया है। दरअसल ये बदलाव प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी जयप्रकाश अग्रवाल और कांग्रेस के केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष मधुसूदन मिस्री की स्वीकृति मिलने के बाद होना है। मध्यप्रदेश से सूची दिल्ली पहुंचे एक महीने से ज्यादा हो गया है, लेकिन बात बन नहीं पा रही है। अब ऐसा लग रहा है कि मामला राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के हस्तक्षेप से निपट पाएगा।

मददगार सुलेमान और बैचमेट के बल्ले बल्ले

प्रवासी भारतीय सम्मेलन में केंद्रीय विदेश मंत्रालय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। इस मंत्रालय में प्रवासी भारतीय विभाग देखने वाले सचिव ओफाक सईद और मध्यप्रदेश के अपर मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान के बैचमेट हैं। सुलेमान प्रदेश में अप्रवासी भारतीय विभाग भी देखते हैं। इंदौर में हुए आयोजन के दौरान सईद और सुलेमान की जोड़ी ने गजब का तालमेल दिखाया और इसी का नतीजा था कि सारे सूत्र इन दो अफसरों के हाथ में ही केंद्रित हो गए। सईद के मददगार की भूमिका निभाने वाले सुलेमान के वजन का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए लंच में उन्हीं के प्रयासों के कारण ऐनवक्त पर प्रदेश के एक वजनदार भाजपा नेता का नाम सूची में शामिल हो पाया। अब ये नेता कौन थे, यह आप पता कीजिए।

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नौकरशाही का दबदबा और टकटकी लगाए बैठे मंत्री

ग्लोबल इन्वेस्टर सम्मिट और प्रवासी भारतीय सम्मेलन में मध्यप्रदेश की नौकरशाही ने अपना दबदबा साबित कर दिया। दोनों आयोजनों में जैसा अफसरों ने चाह वही हुआ और मंत्री तो दर्शक दीर्घा तक ही सीमित हो गए। थोड़ी पूछताछ राज्यवर्धन सिंह की रही, जिनके महकमें ने ही ग्लोबल इन्वेस्टर सम्मिट आयोजित की थी। पर मजेदार यह भी है कि इस सम्मिट के माध्यम से मध्यप्रदेश में जो निवेश आने की बात कही जा रही है, उसमें सिंह से जुड़े विभागों में आने वाला निवेश बहुत कम है। उनका यहां पीछे रह जाना चर्चा का मुद्दा भी बन गया है।

किरण देशमुख से पंगा अब भारी पड़ रहा है संजय चौधरी को

सरकारी नौकरी में रहते हुए कई अहम पदों पर रहे भारतीय पुलिस सेवा के अफसर संजय चौधरी के बुरे दिन शुरू हो गए हैं। चौधरी जिस भी पद पर रहे, वहां दोनों हाथों से माल बटोरने का रिकार्ड बना चुके हैं। खेल संचालक के रूप में उन्होंने जो गुल खिलाए वह तो रिकार्ड पर आ गए थे। जेल महानिदेशक रहते हुए उन्होंने अपने बेटे के माध्यम से क्या नहीं किया। विभाग के तबादलों की सूची बिल्डर बेटे के दफ्तर पर बनती थी।

जमीन के कारोबारी जब जेल में बंद हुए तो उनकी सुविधाओं का फैसला इसी दफ्तर पर नजराना उतरने के बाद हुआ। पैसा खपाने और बेटे को सेट करने के चक्कर में इंदौरी बिल्डर किरण देशमुख के साथ पहले अच्छा तालमेल रहा और जब बिगड़ा तो दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन हो गए। पॉवर में रहते चौधरी ने देशमुख को दिक्कत में डाला, तो अब देशमुख हिसाब बराबर करने में लगे हैं।

चलते-चलते

दिल्ली में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक शुरू होने के साथ ही मध्य प्रदेश में सत्ता एवं संगठन में बदलाव की खबरें तेज हो गई है। कौन किस भूमिका में रहेगा इसका फैसला जल्दी ही होगा पर यह तय है मध्यप्रदेश का विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा और संघ की पसंद के चलते राजसभा सदस्य सुमेर सिंह सोलंकी को महत्वपूर्ण भूमिका मिलने जा रही है।

कांग्रेस की मध्यप्रदेश की राजनीति में सुरेश पचौरी का वजन बढऩे लगा है। संगठन प्रभारी के दायित्व से चंद्रप्रभाष शेखर को मुक्ति, पचौरी के खासमखास राजीव सिंह का संगठन महामंत्री बनना, शोभा ओझा का फिर वजनदार हो जाना, पचौरी के बढ़ते दबदबे का संकेत है। हां, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह के लिए यह जरूर परेशानी का कारण बन सकता है।

पुछल्ला

प्रवासी भारतीय सम्मेलन और इन्वेस्टर सम्मिट के दौरान शहर की साफ-सफाई चाक-चौबंद रखने और सुंदरता निखारने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करने वाले नगर निगम के महापौर पुष्यमित्र भार्गव को ‘फर्स्ट सिटीजन ऑफ इंदौर’ के रूप में जो सम्मान मिलना था, वह आखिर क्यों नहीं मिला। न वे प्रधानमंत्री के लंच में बुलाए गए और न ही पूरे आयोजन में उनकी कोई पूछ-परख हुई। जरा इसका कारण तो पता कीजिए।

अब बात मीडिया की

अभी तक पर्दे के पीछे रहकर कमलनाथ का साथ दे रहे वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बबेले अब घोषित तौर पर उनके मीडिया सलाहकार हो गए हैं। इंडिया टुडे और दैनिक भास्कर में अहम पदों पर रह चुके बबेले पर कमलनाथ बहुत भरोसा करते हैं और इन दिनों वे ही कमलनाथ के साथ ही प्रदेश कांग्रेस के मीडिया से जुड़े मामलों के मुख्य रणनीतिकार हैं।

दैनिक भास्कर के भोपाल और इंदौर संस्करण में आने वाले समय में बड़े बदलाव हो सकते हैं। यह बदलाव वरिष्ठ रिपोर्टर के स्तर पर प्रस्तावित हैं। इंदौर के वरिष्ठ रिपोर्टर हरिनारायण शर्मा भोपाल में महत्वपूर्ण भूमिका में आ सकते हैं, वहीं गुरुदत्त तिवारी और शैलेन्द्र चौहान की भूमिका भी बदल सकती है। इंदौर संस्करण से कुछ ही समय पहले जुड़ी रिपोर्टर आरती मंडलोई भी नई भूमिका में आ सकती है।

स्वदेश समूह के इंदौर और ग्वालियर संस्करण अब एक बोर्ड द्वारा संचालित हो रहे हैं। इस बोर्ड के सर्वेसर्वा विवेक गौरे बनाए गए हैं, जबकि पर्दे के पीछे मुख्य भूमिका अतुल तारे निभा रहे हैं। इस बोर्ड के अस्तित्व में आने के बाद अब स्वदेश इंदौर-ग्वालियर ने भोपाल में भी पांव पसारे हैं और नव स्वदेश के नाम से प्रकाशन शुरू कर दिया है।

अभी तक डिजिटल एडिशन पर फोकस कर रहे अमर उजाला समूह ने अब अपना मध्यप्रदेश संस्करण ई-पेपर के रूप में शुरू कर दिया है। वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक चेंडके के बाद पत्रिका में लम्बे समय से सेवाएं दे रहे वरिष्ठ साथी अर्चुन रिछारिया भी अब अमर उजाला टीम का हिस्सा हो गए हैं। अमर उजाला के इस कदम को आने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा और लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।

इंदौर से अपने पत्रकारिता के करियर की शुरुआत करने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश दुबे दैनिक भास्कर भिलाई के संपादक हो गए हैं। वे लंबे समय से भोपाल भास्कर में सेवाएं दे रहे थे।

14 साल से भी ज्यादा समय से दैनिक भास्कर भोपाल से जुड़े रहे वरिष्ठ साथी भीम सिंह मीणा ने भास्कर को अलविदा कह दिया है उनकी नई पारी का इंतजार सभी को है।