Chhattisgarh : 105 घंटे लंबे संघर्ष के बाद दिव्यांग राहुल ने मौत को दी मात, 65 फीट गहरे बोरवेल में फंसा था मासूम

65 फिट गहरे बोरवेल में फंसा था मासूम 105 घंटे के संघर्ष के बाद दी मौत को मात, एन डी आर ए ,सेना , प्रशासनिक अधिकारीयों व स्थानीय पुलिस के कर्मचारियों ने निकाला सुरक्षित

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के पिरहिद गाँव में पिछले शुक्रवार को ,अपने ही घर के 65 फिट गहरे बोरवेल में फंसे 11 वर्षीय मासूम दिव्यांग राहुल को आख़िरकार 105 घंटे के लम्बे संघर्ष के बाद जिन्दा निकाल लिया गया। एन डी आर ए ,सेना , प्रशासनिक अधिकारीयों व स्थानीय पुलिस के 500 से अधिक कर्मचारियों ने शुक्रवार से ही गंभीर बचाव अभियान के द्वारा बच्चे के जीवन की रक्षा की। बच्चे के बोरवेल से निकलते ही भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा सारा गाँव , बच्चे के परिवार वाले और गाँव वालों सहित बचाव कर्मियों की भी नम हुई आँखे। मौके पर उपस्थित डॉक्टरों की टीम ने जाँच के बाद एम्बुलेंस के द्वारा विशेषज्ञों की निगरानी में राहुल को बिलासपुर जिले के अपोलो हॉस्पिटल रैफर किया ,जोकि अब पूरी तरह से ठीक है।

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साँप और मेढ़क के साथ बोरवेल में फंसा था मासूम

बीते शुक्रवार से 65 फिट बोरवेल के गड्डे में फंसे दिव्यांग बच्चे राहुल के ये 105 घंटे ज़िंदगी और मौत की जंग से कम नहीं रहे , जिसमें आखिरकार ज़िंदगी की हुई जीत। जांजगीर-चांपा जिले के कलेक्टर श्री जितेंद्र शुक्ला ने मिडिया से बात करते वक्त बतलाया कि , बच्चा जिस बोरवेल के गड्डे में गिरा था उसमें उसके साथ एक साँप और मेंढक भी था। बच्चे का इतने लम्बे संघर्ष के बाद जीवित बच निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है। बिलकुल भी आशानुकूलित परिस्थितियां नहीं थी 65 फीट तक चट्टानों को काट कर किया गया रेस्क्यू ऑपरेशन बेहद ही कठिन था , रस्सी के द्वारा बच्चे तक पहुंचाए जाते थे फल और पानी। लेकिन आखिर में ज़िंदगी की जित हुई , और बच्चे को सकुशल बचा लिया गया।

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पहले भी हो चुके हैं ऐसे कई मामले , कब लेंगे सबक

इस प्रकार के मामले कई बार सामने आते रहे हैं। वर्षों पूर्व प्रिंस नाम के एक बच्चे को भी इसी तरह रेस्क्यू ऑपरेशन के द्वारा बचाया गया था , ये घटना भी काफी सुर्ख़ियों में रही। इसके अलावा भी इसप्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं कई जगहों पर हुईं , जिनमें कुछ बच्चों को दुर्भाग्य से बचाया नहीं जा सका । सवाल यह उठता है कि आखिर कौन है इन दुर्घटनाओं का जिम्मेदार। कब तक मासूम इस प्रकार से काल रूपी गड्डों में जिंदगी और मौत से संघर्ष करते रहेंगे। आखिर कब सबक लिया जाएगा कि ये खुले गहरे गड्डे आखिर कितने जानलेवा साबित हो सकते हैं।