शशिकांत गुप्ते का एक जोरदार व्यंग

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फ़िल्म शोले का प्रसिद्ध संवाद,”कितने आदमी थे।”फ़िल्म में यह संवाद खलनायक का अभिनय करने वाले गब्बरसिंह ने बोला है।गब्बरसिंह इस फ़िल्म में डाकू की भूमिका में हैं।

परिवर्तन संसार का नियम है।इस नियम के अनुसार बीहड़ में छिप कर डाका डालने वाले डाकुओं की संख्या में गिरावट आती गई।असली डाकुओं की स्थिति बहुत ही संघर्ष पूर्ण होती थी।कई दिनों तक खाना भी नसीब नहीं होता था।समय के साथ परिवर्तन होता गया और असली डाकुओं की जगह सफेद पोश डाकुओं ने लेली।

सफेद पोश डाकुओं को घने,खतरनाक बीहड़ो में नही रहना पड़ता है।यह सफेद पोश डाकू आलीशान कोठियों में सारे भौतिक सुख साधनों के साथ रहते हैं।यह गब्बरसिंह जैसे संवाद नहीं बोलते”कितने आदमी थे”यह सफेद पोश बोलते हैं,यह मेरा या मेरे आदमी एक और बहुवचन में भी बोलते हैं।

यह डाकू शासकीय नियम कानून को जेब मे रखते हैं।यह राजनीति नहीं करते हैं।यह राजनीति में सलग्न लोगों के सरपरस्त होते हैं।कानून के हाथ सिर्फ लंबे होते हैं,इनकी पहुँच ऊपर से भी ऊपर तक होती है। जैसा की प्रारम्भ में ही कहा है।परिवर्तन संसार का नियम है।कभी कभी यह मान्यता चरितार्थ हो जाती है कि,पाप का घड़ा एक न एक दिन फूटता ही है।इसी तरह इनका भी घड़ा फूटता तो नही है,राजनीति भाषा मे कहेंगे तो फोड़ा जाता है।इनके फूटते हुए,घड़े को कुछ धार्मिक भजन गायक,जो राजनीति में सलग्न होते हैं,सहन नहीं कर पाते और उनमें भाई चारे की भावना जागृत हो जाती है।ऐसे लोग अति धार्मिक होने से पंचतत्व में सिर्फ और सिर्फ अग्नि को ही चुनते है।यह लोग फिल्मी संवाद तो प्रत्यक्ष रूप से बोल नही पाते”यह अब मेरे आदमी है”

लेकिन ताड़ने वाले भी कयामत की नजर रखते हैं, “आसमा तो क्या जमीन पर नजर रखते है”।ऐसी घटनाओं के घटित होने से यह कहावत सत्य हो जाती है कि, कोई भी युद्ध याआपसी वैमनस्य,निश्चित ही जर,जोरू और जमीन के कारण ही होते हैं।जोरू शब्द से एकाएक मधु शब्द स्मृति पटल पर आया जिसे आँग्ल भाषा मे हनि कहते हैं।न्यायालय में विचाराधीन मामलों में चुप्पी साधना ही समझदारी है।

मुख्य मुद्दा है,परिवर्तन का,परिवर्तन अवश्यम्भावी है।कालचक्र की तरह।अन्तरिक्ष में चलने वाले ग्रह भी हमेशा सीधे नहीं चलते,वक्र होजाते है।जब यह वक्रगति में होते हैं, तब अच्छे अच्छों को सीधा कर देते हैं। इन सब शाश्वत बातों पर बहस की गुंजाईश नहीं होती।यह एक कटु सत्य है कि,परिवर्तन संसार का नियम है।

शशिकान्त गुप्ते

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