मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा ढांचे में प्राचीन मंदिर से जुड़े कई स्थापत्य अवयवों का उपयोग दिखता है। दस्तावेज में 12वीं सदी के संस्कृत शिलालेख, शिव से संबंधित चिह्न और वासुकी नाग के संकेत मिलने की बात दर्ज की गई है।
यह रिपोर्ट अदालत के निर्देश पर किए गए वैज्ञानिक सर्वे के बाद तैयार हुई। सर्वे के दौरान परिसर के अलग-अलग हिस्सों का दस्तावेजीकरण किया गया और पत्थरों, स्तंभों, आधार संरचनाओं तथा उत्कीर्ण लेखों का परीक्षण किया गया। रिपोर्ट में कई जगहों पर मंदिर वास्तु से मेल खाते निर्माण तत्वों का उल्लेख है।
ASI के निष्कर्षों में यह भी कहा गया है कि परिसर की मौजूदा संरचना में ऐसे हिस्से शामिल हैं जो पहले से मौजूद किसी बड़े धार्मिक ढांचे से लिए गए लगते हैं। रिपोर्ट में दर्ज अवलोकनों के मुताबिक स्तंभों, बीमों और शिलाखंडों पर बनी आकृतियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि इन्हें मूल रूप से मंदिर परिसर में प्रयुक्त किया गया था।
रिपोर्ट में क्या-क्या प्रमुख बिंदु दर्ज
दस्तावेज में संस्कृत भाषा और प्राचीन लिपियों के शिलालेखों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें विशेषज्ञों ने मध्यकालीन कालखंड से जोड़ा है। कई पत्थरों पर देवी-देवताओं, नाग आकृतियों और पारंपरिक धार्मिक चिह्नों के साथ शिल्पकारी मिलने की बात भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ चिह्न शिव परंपरा और वासुकी प्रतीक से मेल खाते हैं।
सर्वे टीम ने परिसर के विभिन्न हिस्सों में सामग्री के पुनः उपयोग (spolia) की संभावना भी दर्ज की है। इसका मतलब है कि पुराने ढांचे के हिस्सों को बाद के निर्माण में लगाया गया हो सकता है। ASI की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष प्रमुख रूप से सामने आता है कि परिसर का इतिहास बहु-स्तरीय है और इसमें पहले के स्थापत्य तत्व सुरक्षित या पुन: प्रयुक्त रूप में मौजूद हैं।
रिपोर्ट में किसी एक पक्ष के धार्मिक दावे का अंतिम निर्णय नहीं दिया गया है, लेकिन उपलब्ध संरचनात्मक और अभिलेखी साक्ष्यों का तकनीकी विवरण प्रस्तुत किया गया है। कानूनी दृष्टि से यही तकनीकी भाग आगे अदालत में परीक्षण का आधार बनेगा।
अदालती प्रक्रिया और विवाद का संदर्भ
भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच दावे बने हुए हैं। हिंदू पक्ष इसे देवी वाग्देवी का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। इसी विवाद के बीच अदालत ने ASI को विस्तृत सर्वे कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था।
सर्वे की कार्यवाही सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी में हुई थी। दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कई चरणों में निरीक्षण, रिकॉर्डिंग और दस्तावेजों का संकलन किया गया। बाद में ASI ने अपनी रिपोर्ट अदालत में जमा की, जिसके प्रमुख निष्कर्ष अब सार्वजनिक चर्चा में हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार आगे की सुनवाई में रिपोर्ट के हर तकनीकी बिंदु की व्याख्या होगी। अदालत यह देखेगी कि पुरातात्विक साक्ष्य, ऐतिहासिक अभिलेख और राजस्व दस्तावेज किस हद तक एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। ऐसे मामलों में अंतिम फैसला आमतौर पर केवल एक रिपोर्ट पर नहीं, बल्कि समग्र साक्ष्य और कानूनी तर्कों के आधार पर होता है।
फिलहाल ASI रिपोर्ट ने बहस को नई दिशा दी है। 12वीं सदी के शिलालेखों, शिव-वासुकी संकेतों और मंदिर शैली के अवयवों के उल्लेख ने मामले को तथ्यात्मक स्तर पर और केंद्र में ला दिया है। अब इस दस्तावेज की न्यायिक जांच के बाद ही अगले निष्कर्ष स्पष्ट होंगे।











