फरवरी 2026 के आखिरी सप्ताह से शुभ कार्यों के कैलेंडर में बड़ा बदलाव दिखेगा। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 24 फरवरी 2026 से होलाष्टक आरंभ हो रहा है। परंपरागत मान्यता में होलाष्टक के दौरान विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन और नए मांगलिक संस्कारों से परहेज किया जाता है। इस वजह से कई परिवार शादी और अन्य कार्यक्रमों की तारीखें होलाष्टक से पहले या इसके बाद तय करते हैं।
होलाष्टक का समय हर साल होली से पहले आता है और इसे फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक की अवधि माना जाता है। धार्मिक और ज्योतिष परंपरा में इस अवधि को संयम का समय कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि इस दौरान बड़े निर्णयों और मांगलिक आयोजनों को टालना बेहतर रहता है। हालांकि पूजा-पाठ, दान, जप और नियमित धार्मिक कार्य चलते रहते हैं।
24 फरवरी से क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा यह चरण
2026 में 24 फरवरी से होलाष्टक लगने के साथ विवाह मुहूर्तों की गति पर सीधा असर पड़ेगा। जो परिवार फरवरी के अंतिम दिनों या मार्च के शुरुआती दिनों में शादी की योजना बना रहे हैं, उन्हें पंचांग के साथ मुहूर्त मिलान फिर से करना होगा। शहरों में बैंक्वेट, कैटरिंग और डेकोरेशन बुकिंग भी इसी कैलेंडर के अनुसार आगे-पीछे होती हैं, इसलिए तारीख तय करते समय धार्मिक और व्यावहारिक दोनों पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है।
ज्योतिषीय परंपरा में विवाह के लिए केवल तिथि ही नहीं, बल्कि ग्रह स्थिति भी देखी जाती है। इसी क्रम में शुक्र की स्थिति को खास माना जाता है। जब शुक्र अस्त रहता है, तब कई पंडित विवाह टालने की सलाह देते हैं। शुक्र उदय होने पर विवाह के लिए अनुकूलता बढ़ने की मान्यता है। 2026 के इस चरण में भी होलाष्टक समाप्ति के बाद शुक्र उदय की स्थिति को विवाह तय करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
शुक्र उदय और विवाह मुहूर्त का संबंध
शुक्र ग्रह को दांपत्य और वैवाहिक सुख का कारक माना जाता है। इसलिए मुहूर्त विज्ञान में इसके अस्त और उदय की चर्चा सबसे अधिक होती है। सामान्य तौर पर जब शुक्र उदय में आता है, तब कई जगह रुके हुए वैवाहिक कार्यक्रमों की तिथि दोबारा निकाली जाती है। इस बार भी होलाष्टक समाप्त होने के बाद जिन परिवारों की शादी लंबित है, वे शुक्र उदय के बाद उपलब्ध मुहूर्तों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
मुहूर्त निकालते समय केवल एक ग्रह नहीं देखा जाता। तिथि, वार, नक्षत्र, लग्न, भद्रा, चंद्र स्थिति और दोनों पक्षों की कुंडली का मिलान साथ में होता है। इसलिए अलग-अलग क्षेत्र और परंपरा में विवाह की स्वीकार्य तिथियों में अंतर दिखाई देता है। विशेषज्ञ आम तौर पर स्थानीय पंचांग और विश्वसनीय आचार्य से पुष्टि के बाद ही अंतिम निर्णय लेने की सलाह देते हैं।
सूर्य गोचर का कैलेंडर पर प्रभाव
सूर्य गोचर भी मांगलिक कार्यों के चयन में उपयोगी कारक माना जाता है। जब सूर्य राशि परिवर्तन करता है, तब कई लोग नए काम, यात्रा या निवेश से पहले शुभाशुभ का आकलन कराते हैं। विवाह के मामले में सूर्य गोचर को अकेले निर्णायक नहीं माना जाता, लेकिन यह समग्र ग्रह स्थिति का हिस्सा रहता है। इसीलिए होलाष्टक के बाद, शुक्र उदय और सूर्य गोचर को साथ रखकर नए मुहूर्तों की सूची तैयार की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के साथ एक व्यावहारिक पक्ष भी जुड़ा है। जिन परिवारों ने पहले से बुकिंग कर रखी है, वे तिथि बदलने की स्थिति में आयोजन लागत, मेहमानों की उपलब्धता और स्थल की नई तारीख पर भी विचार करते हैं। कई आयोजक संस्थान भी पंचांग आधारित सीजन में मांग बढ़ने की वजह से अग्रिम योजना की सलाह देते हैं।
होलाष्टक में कौन से काम किए जा सकते हैं
परंपरा में होलाष्टक के दौरान शुभ संस्कार टालने की बात कही जाती है, लेकिन दैनिक पूजा, व्रत, दान और आध्यात्मिक साधना जारी रहती है। बहुत से परिवार इस अवधि में हनुमान पूजा, विष्णु उपासना, रामचरितमानस पाठ या होली से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। यानी यह समय पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता, बल्कि मांगलिक कार्यों की जगह धार्मिक अनुशासन पर जोर देता है।
अगर किसी परिवार में विशेष परिस्थिति हो, तो निर्णय स्थानीय परंपरा और विद्वानों की सलाह से लिया जाता है। अलग संप्रदायों और राज्यों में व्यवहारिक नियमों में थोड़ा अंतर मिल सकता है। इसलिए एक सामान्य सूचना के आधार पर अंतिम निर्णय लेने के बजाय व्यक्तिगत मुहूर्त परामर्श लेना बेहतर माना जाता है।
कुल मिलाकर 24 फरवरी 2026 से शुरू होने वाला होलाष्टक शादी-ब्याह के कैलेंडर में महत्वपूर्ण विराम लाएगा। इसके बाद शुक्र उदय और सूर्य गोचर की अनुकूलता मिलने पर विवाह मुहूर्त फिर सक्रिय होंगे। जिन परिवारों के कार्यक्रम तय होने हैं, उनके लिए अभी से पंचांग, बुकिंग और परामर्श की संयुक्त तैयारी करना उपयोगी रहेगा।











