जानिये छठ पूजा से जुड़ीं कथा

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नई दिल्ली। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक चलने वाला यह पर्व चार दिन का छठ नहाय खाय के साथ शुरू होता है। आइये जानते है इस से जुड़ीं कथा कैसे शुरू हुई इसके बारे में कई मान्यताएं प्रचलित हैं। प्रियव्रत जो पहले मनु माने जाते हैं। इनकी कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने पुत्रेष्ठि यज्ञ करने को कहा। इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ।

तभी देव लोक से ब्रह्मा की मानस पुत्री प्रगट हुईं जिन्होंने अपने स्पर्श से मरे हुए बालक को जीवित कर दिया। तब महाराज प्रियव्रत ने अनेक प्रकार से देवी की स्तुति की। देवी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो। तब राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की।

दूसरी मान्यता के अनुसार क‌िंदम ऋष‌ि की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए जब महाराज पांडु अपनी पत्नी कुंती के साथ वन में दिन गुजार रहे थे। तब उन दिनों पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महारानी कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की। इससे कुंती पुत्रवती हुई। इसलिए संतान प्राप्ति के लिए छठ पर्व का बड़ा महत्व है। कुंती की पुत्रवधू और पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने उस समय सूर्य देव की पूजा की थी जब पाण्डव अपना सारा राजपाट गंवाकर वन में भटक रहे थे।

छठ पर्व के बारे में यह धारणा है क‌ि यह मुख्य रूप से ब‌िहारवास‌ियों का पर्व है। इसके पीछे कारण यह है क‌ि इस पर्व की शुरुआत अंगराज कर्ण से माना जाता है। अंग प्रदेश वर्तमान भागलपुर में है जो ब‌िहार में स्‍थ‌ित है।अंगराज कर्ण के विषय में कथा है कि, यह पाण्डवों की माता कुंती और सूर्य देव की संतान है। कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य देव को मानते थे।अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे। धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया।

छठ पर्व में सूर्य की पूजा का संबंध भगवान राम से भी माना जाता है। दीपावली से छठे द‌िन भगवान राम ने सीता के संग अपने कुल देवता सूर्य की पूजा सरयू नदी में की थी। भगवान राम ने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया। सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे।

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