आरती के बिना अधुरी होती हैं पूजा, जाने इससे जुड़ी कुछ खास बाते

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किसी भी पुजा को आरती किए बिना सफल नहीं माना जाता हैं। पूजा के समापन में आरती का महत्व सबसे ज्यादा होता हैं। शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता हो, पूजन की विधि भी नहीं जानता हो, तो ऐसे पूजन कार्य में यदि श्रद्धा के साथ सिर्फ आरती ही कर ली जाए तो भी प्रभु उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं। आरती करने से ही हमे ईश्वर का आशिर्वाद मिल जाता हैं। आइए जानते हैं कि आरती के क्या महत्व हैं और इसे करने के लिए किन बातों का ध्यान रचाना चाहिए।

आरती के नियम

पुराणों में आरती को लेकर काफी कुछ कहा गया हैं। पुराणों के अनुसार कुमकुम, अगर, कपूर, घृत और चन्दन की पांच या सात बत्तियां बनाकर अथवा रुई और घी से बत्तियां बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुए प्रभु की आरती करनी चाहिए। घरों में आरती को आम तौर पर सुबह और शाम के समय ही करना चाहिए।

आरती के बाद याद से करें ये काम

आरती करने के बाद दोनों हाथों से आरती ग्रहण करना अनिवार्य होता हैं। इसका कारण हैं कि ईश्वर की शक्ति आरती की ज्योति में समा जाती है, जिसको भक्त अपने मस्तक पर ग्रहण करके धन्य हो जाते हैं। आरती ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा दैवीक शक्ति को पूजन-स्थल तक पहुंचने का मार्ग मिल जाता है।

वैज्ञानिकों ने भी आरती को लेकर ऐसा कहा हैं

वैज्ञानिकों के अनुसार आरती में उपयोग होने वाली रूई की बत्ती के संग घी या कपूर जब जलते हैं, तो वातावरण सुगन्धित हो जाता है। जिससे आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। मंदिरों में आरती शंख ध्वनि, घंटे-घड़ियाल के साथ होती है। घंटे-नाद से कई शारीरिक कष्ट दूर होते हैं व मन की शांति के साथ-साथ नई मानसिक ऊर्जा मिलती है। अनेक शोधों से स्पष्ट हो चुका है कि घंटे और शंख से निकली ध्वनियां कई तरह के संक्रामक कीटाणुओं का खत्म कर देती है।

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