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न हो कमीज तो पांवो से पेट ढक लेंगे

जयराम शुक्ल लोकभाषा के बडे़ कवि कालिका त्रिपाठी ने कभी रिमही में एक लघुकथा सुनाई थी। कथा कुछ ऐसी थी कि..दशहरे के दिन ननद और भौजाई एक खेत में घसियारी कर रही थी। घास काटते-काटते बात चल पड़ी.. ननद बोली-भौजी ये दशहरा क्या होता है..? भौजी ने अकबकाते हुए जवाब दिया- ये दशहरा में न.. […]