केकेआर और एलएसजी के बीच खेले गए मुकाबले के बाद एक नया नाम अचानक सुर्खियों में छा गया है—मुकुल चौधरी। अब तक उनके लंबे-लंबे छक्कों की चर्चा सिर्फ नेट्स तक सीमित थी, जहां कई कमेंटेटर्स और खिलाड़ी, यहां तक कि अर्जुन तेंदुलकर भी, उनकी बल्लेबाजी के मुरीद हो चुके थे।
लेकिन इस मैच में उन्होंने जो किया, उसके बाद हर कोई उनके बारे में जानना चाहता है। केकेआर के खिलाफ दबाव भरे मुकाबले में जिस तरह से उन्होंने आखिरी ओवरों में खेल का रुख पलटा, उसने फैंस के साथ-साथ क्रिकेट एक्सपर्ट्स को भी हैरान कर दिया।
केकेआर के खिलाफ खेली मैच जिताऊ पारी
ऋषभ पंत की कप्तानी वाली लखनऊ टीम ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी चुनी। केकेआर ने संघर्ष करते हुए 181 रन का चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया। अजिंक्य रहाणे ने 24 गेंदों में 41 रन बनाए, जबकि अंगकृष्ण रघुवंशी ने 45 रन की अहम पारी खेली।
रोवमैन पॉवेल ने भी 24 गेंदों पर 39 रन जोड़े और टीम को मजबूत स्थिति में पहुंचाया। केकेआर की गेंदबाजी भी दमदार रही, जिससे मुकाबला पूरी तरह उनके पक्ष में जाता दिख रहा था।
हार की कगार पर थी लखनऊ
लखनऊ की पारी लड़खड़ा गई थी और टीम ने 125 रन पर 6 विकेट गंवा दिए थे। इसके बाद 128 रन तक पहुंचते-पहुंचते 7वां विकेट भी गिर गया, जिससे जीत की उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी थीं। लेकिन यहीं से मुकुल चौधरी ने मोर्चा संभाला और मैच का रुख पलट दिया। उन्होंने सिर्फ 27 गेंदों में 54 रन की विस्फोटक पारी खेली, जिसमें 7 छक्के और 2 चौके शामिल थे। उनका स्ट्राइक रेट 200 का रहा और उन्होंने केकेआर के हाथों से जीत छीन ली।
कौन हैं मुकुल चौधरी?
मुकुल चौधरी राजस्थान के झुंझुनूं जिले से ताल्लुक रखते हैं। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने और उनके परिवार ने काफी संघर्ष किया है। उनके पिता दलिप चौधरी पेशे से शिक्षक रहे हैं और उन्होंने बेटे के क्रिकेट सपने को पूरा करने के लिए काफी मेहनत की।बेहतर ट्रेनिंग दिलाने के लिए परिवार जयपुर शिफ्ट हो गया। मुकुल ने सीकर की एसबीएस क्रिकेट अकादमी से अपने खेल को निखारा और वहीं कई साल तक ट्रेनिंग ली।
पिता का सपना, बेटे ने किया पूरा
मैच के बाद प्लेयर ऑफ द मैच बनने पर मुकुल भावुक नजर आए। उन्होंने बताया कि उनका क्रिकेट सफर उनके जन्म से पहले ही शुरू हो गया था, क्योंकि उनके पिता का सपना था कि उनका बेटा क्रिकेटर बने। उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह जल्दी क्रिकेट शुरू नहीं कर सके और 12-13 साल की उम्र में उन्होंने इस खेल को गंभीरता से लेना शुरू किया। आगे बढ़ने के लिए उन्होंने सीकर से जयपुर का रुख किया, ताकि बड़े स्तर पर खुद को साबित कर सकें।











