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‘रोशोगुल्ला’ पर एक दिवस डेडीकेट करने के लजीज पहलू!

Posted on: 03 Nov 2018 09:39 by Ravindra Singh Rana
‘रोशोगुल्ला’ पर एक दिवस डेडीकेट करने के लजीज पहलू!

देर से ही सही बंगाल को अपनी मशहूर ‍स्वीट डिश रसगुल्ले ( बांगला में रोशोगुल्ला) का महत्व समझ आ गया है। वहां की ममता दी सरकार ने तय किया है कि वह हर साल 14 नवंबर को राज्य में ‘रसगुल्ला दिवस’ मनाएगी। रसगुल्ला छेने और चाशनी से बना सुस्वादु व्यंजन है, जिसे गपागप खाने की परंपरा है। शायद इसी लिए बंगला उच्चारण भी अोकारांत हो जाते हैं। बंगाल के लिए तो यह व्यंजन युद्ध का ‘विजय दिवस’ भी है। क्योंकि रसगुल्ले पर भौगोलिक अधिकार की लंबी लड़ाई उसने पिछले साल इसी दिन जीती थी। यूं रसगुल्ले पर अोडिशा ने भी पूरा अधिकार जताया था। लेकिन उसका ‘जीआई टैग’ (भौगोलिक पहचान) बंगाल को मिला। माना गया कि रसगुल्ला मूल रूप से बंगाल की पैदाइश है। बाद में अोडिशा पहुंचा। यूं रसगु्ल्ला अब एक वैश्विक मिठाई बन चुकी है।

कई देशों को इसका निर्यात होता है। यह टिकती भी खूब है। बंगालियों को तो यह उतनी ही प्रिय है, जितनी कि मछली। जो भी बंगाल आता है वह रसगुल्ला चखे बिना नहीं रह सकता। बंगाल सरकार चाहती है कि रसगुल्ले का खूब प्रचार-प्रसार हो। लोग खूब रसगुल्ले खाएं ता‍कि इस व्यवसाय में लगे लोगों का धंधा बढ़े। रसगुल्ले के माध्यम से बंगाली कल्चर का स्वाद भी दूर-दूर तक पहुंचे। इसी उद्देश्य से राज्य सरकार के हाउसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट काॅरपोरेशन (हिडको) की ओर से इस दिन विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। इसके तहत कोलकाता के न्यूटाउन के मिष्टी हब में रसगुल्ले बनाने, उसकी खूबियों और अन्य ऐतिहासिक पहलुओं के बारे में विस्तार से चर्चा होगी। इसमें पश्चिम बंगाल और देश के अन्य हिस्सों से रसगुल्ले पर रिसर्च करनेवाले विशेषज्ञों को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया है। संक्षेप में कहें तो यह रसगुल्ले की महत्ता और खास डिश के रूप में लोगों में इसके प्रति जागरूकता पैदा करने की अच्छी पहल है।

आधुनिक सभ्यता का एक अहम पहलू यह है कि आजकल किसी भी खास चीज की अोर दुनिया भर का ध्यान आकर्षित करने तथा उसके प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए उसे एक ‘डे’ में तब्दील कर ‍दिया जाता है। दुनिया में हर साल ऐसे कई ‘डे’ मनाए जाते हैं। लेकिन खाद्य पदार्थो और व्यंजनों को लेकर सेलीब्रेट किए जाने वाले ‘डे’ का स्वाद कुछ और ही होता है। यानी खूब बनाअो, खूब खाअो और खूब खिलाअो। खाने पीने को लेकर इस लोक जागृति का अपना अलग आनंद और टेस्ट है। उदाहरण के लिए इटली में ईसाइयों के त्यौहार ईस्टर के 47 दिन पहले ‘पेनकेक डे’ मनाया जाता है। यह हमारे मीठे चीले जैसा व्यंजन है।

दक्षिण भारत की इडली भी अब इंटरनेशनल डिश हो गई है। इसे पापुलर करने तथा इसके स्वाद को प्रस्थापित करने हर साल 30 मार्च को ‘विश्व इडली दिवस’ मनाया जाता है। ये रेसिपी दक्षिण भारत में हजार साल से ज्यादा समय से बनाई जाती रही है। पश्चिमी देशों से आए केक और चाॅकलेट अब भारतीय खाद्य संस्कृति का भी हिस्सा बन गए हैं। इनके लिए भी दुनिया में क्रमश: 7 मई और 7 जुलाई दिन तय किए गए हैं। आॅस्ट्रेलिया में 23 अगस्त को ‘नेशनल बर्गर डे’ मनाया जाता है। इस व्यंजन का आविष्कार सबसे पहले अमेरिका में 1900 में हुआ बतााया जाता है। अब यह पूरे दुनिया में खाया और खिलाया जाता है। ब्राजील में 10 जुलाई को ‘नेशनल पिज्जा डे’ मनाने की परंपरा है। जबकि अमेरिका में हर साल 23 जनवरी को नेशनल पाइ डे’ मनाया जाता है।

अब रसगुल्ला किसकी ईजाद है, इस पर लंबा विवाद चला। क्योंकि बंगाल के पड़ोसी राज्य अोडिशा ने दावा किया कि रसगुल्ला अोडिशा की रेसिपी है, क्योंकि यह पुरी के जगन्नाथ मंदिर पर चढ़ती है। रथ यात्रा के दौरान रूठे भगवान रसगुल्ला ( अोडिया में रसगोला) खाकर ही प्रसन्न होते हैं। इसी पुरातन परंपरा का हवाला देते हुए अोडिशा सरकार ने राज्य में अपने यहां ‘रसगोला उत्सव’ मनाना तीन साल पहले ही शुरू कर दिया था। लेकिन रसगुल्ले को अपनी मिठाई सिद्ध करने की लड़ाई अोडिशा सरकार हार गई और यह अधिकार बंगाल को ‍िमला। वैसे भारतीय व्यंजनों और मिठाइयों का कोई निश्चित इतिहास कम ही उपलब्ध है। शायद इसलिए कि हम बनाने खाने में ही इतने मगन रहे कि उसको दस्तावेजों में कम ही दर्ज किया।

हालांकि हमारे पाकशास्त्र के ग्रंथों में कई व्यंजनों को बनाने की विधियां उपलब्ध हैं। शायद यही बात बंगाल के पक्ष में गई। इस बात का प्रमाण है ‍िक रसगुल्ला बनाने की शुरूआत 1868 में बंगाली नोबिन चंद्र दास ने की। तब से लेकर अब तक मामूली फेरबदल के साथ रसगुल्ला मिठाइयों में अपनी सत्ता को कायम रखे हुए है। आजाद भारत में तो रसगुल्ला अपने चचेरे भाई गुलाब जामुन को तगड़ी टक्कर दे रहा है। डायबिटीज के रेड सिग्नल भी इसकी स्वाद एक्सप्रेस को नहीं रोक सके हैं। रसगुल्ले का रसीलापन लाल-भगवा की लड़ाई के परे है। रसगुल्ले की असीम लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसरो ने अंतरिक्ष में ले जाने के लिए ‘ड्राय रसगुल्ले’ तैयार ‍किए हैं, जो मानव मिशन में भारतीय अंतरिक्ष यात्री साथ ले जा सकेंगे। मतलब यह कि बगैर रसगुल्ले के धरती पर तो क्या अंतरिक्ष में भी जीना बेकार है !

एक समृद्ध खाद्य संस्कृति और बहुस्वादीय पाकशास्त्र होने के बावजूद हमारे यहां कि किसी खाद्य पदार्थ के नाम से कोई दिवस समर्पित करने की संस्कृति जरा नई है। इस हिसाब से अोडीशा से भी पहले गुजरात ने इस मामले में बाजी मार ली थी। वहां हर साल 14 जनवरी को ‘उंधियुं दिवस’ मनाया जाता है। उंधियुं कच्चे केले, हरी सब्जियां, आलू और बेसन आदि से बनाई जाने वाली स्वादिष्ट डिश है, जिसे त्रिशंकु आकार के ‍मिटटी के बर्तन में पकाया जाता है। इस खस्ता डिश को पूरी और श्रीखंड के साथ खाया जाता है। अगर जीआई टैग की बात करें तो मध्यप्रदेश को कड़कनाथ मुर्गे का जीआई टैग मिल चुका है। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार उसके नाम से कोई दिन डेडीकेट करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है, क्योंकि इसमें शाकाहार का पूर्वाग्रह आड़े आ रहा है।

बहरहाल गुजराती ‘उंधियुं’ हो या ‘रसगुल्ला’, दोनो पर एक खास दिन फोकस करने का मकसद इनकी मार्केटिंग, इसके स्वाद को लोकप्रिय बनाना और प्रकारातंर से आंचलिक पाक संस्कृति की विशिष्टता को रेखांकित करना है। इसे गुजरात और बंगाल माॅडल की खाद्य खूबियों की नजर से देखना चाहिए। एक समय लोकमान्य तिलक ने कहा था कि बाकी भारत जो आज सोचता है, वह बंगाल पहले ही सोच लेता है, लेकिन मार्केटिंग के मामले में लगता है बंगाल अब दूसरों के मुकाबले बाद में जागता है, सो रसगुल्ला जागरूकता के मामले में भी देर से जागा। लेकिन देर आयद, दुरूस्त आयद। रसगुल्ले के मामले में सब चलेगा। एक सुस्वादु मिष्टी व्यंजन को इस तरह से इज्जत और ताकत बख्शने का स्वागत ही ‍किया जाना चाहिए। आखिर हमारे व्यंजनों को हम ही लोकप्रिय नहीं बनाएंगे तो कौन बनाएगा?

 

अजय बोकिल की कलम से

 

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