सियासी किस्से ,सियासी बातें

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सियासत की शक्ल साल दर साल विकृत होती जा रही है । राजनीतिक गलियारों की हर घटना आने वाले दिनों को लेकर नई नई आशंकाएं खड़ी कर रही है । ऐसे में इस देश के बौद्धिक वर्ग की अपनी चिंताओं का आकार विकराल हो रहा है । इस चिंता का एक कारण यह भी है कि मुल्क में नई नस्ल के बीच लोकतंत्र की वैचारिक नींव कमज़ोर होने पर गहराई से कोई बहस भी नहीं छेड़ी का रही है । हमारा शैक्षणिक पर्यावरण अच्छे इंजीनियर,डॉक्टर, बैंकर और अफसर तो बना देता है,लेकिन उनमें राजनीतिक चेतना का एक विराट शून्य नजर आता है ।उनके पाठ्यक्रम भी उन्हें इस दिशा में जागरूक नहीं करते । इस वजह से राजनीति में न तो अच्छे लोग आ पा रहे हैं और न ही वे खुद भी जाना चाहते हैं । मगर हिंदुस्तान के आज़ाद होने के बाद एक आम नागरिक के मन में जो औसत ज़िम्मेदारी, ईमानदारी और समर्पण दिखाई देता था वह भी इन दिनों नहीं दिखाई देता । अपवाद के तौर पर भले ही कुछ जुगनू चमकते नज़र आएं,मगर आबादी का बड़ा वर्ग देश के प्रति अपने सरोकारों को लेकर उदासीन सा है ।

इसके मद्देनजर दिल्ली के स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स ने समाज के अलग अलग क्षेत्रों में सक्रिय समझदार लोगों के साथ अच्छी राजनीति और उसके मूल्यों पर चिंतन का सिलसिला शुरू किया है । हर महीने अपने कार्यक्रमों में अलग अलग प्रदेशों से बुद्धिजीवियों को आमंत्रित कर उनके साथ सियासत के सरोकारों पर मंथन का सिलसिला अब लोकप्रिय हो चला है ।

इस सप्ताह दिल्ली में एक ऐसे ही कार्यक्रम में शिरकत करने का अवसर मिला । भारत की राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और सरदार भगतसिंह की वैचारिक भूमिका के किस्से और संघर्ष की कुछ गाथाएं मुझे सुनाने का अवसर मिला । प्रतिभागियों के लिए इनमें से अनेक उदाहरण हैरत में डालने वाले थे ।उनका कहना था कि भारत की इस परंपरा को व्यापक तौर पर समाज की आख़िरी पंक्ति तक ले जाना अत्यंत आवश्यक है । आज हम आज़ादी के बाद की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम तेज़ी से नहीं कर पाए हैं । क्रांति की अवधारणा, गांधी दर्शन, भगतसिंह और नेता जी के विचार नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए बड़ा आंदोलन छेड़ने की ज़रूरत है ।

दुर्भाग्य से हमने इन प्रतीकों को आपस में विरोधियों के तौर पर स्थापित कर दिया है । आज़ादी के अफसाने पढ़ जाइए । पूर्वजों की कुर्बानियां देखकर अपने आप पर शर्म या कहूं तो घिन आने लगती है ।
इस संस्था ने तबियत से एक पत्थर उछालने का काम किया है । संस्था की सूत्रधार सुषमा जी इसके लिए साधुवाद की हकदार हैं ।सवा सौ करोड़ के मुल्क में कहीं से तो आगाज़ होना ही था ।अब यह संस्था दिल्ली से बाहर राज्यों की राजधानियों और महानगरों में विस्तार करके साफ़ सुथरी सियासत के लिए आंदोलन का रूप लेने जा रही है । मेरी शुभकामनाएं । चित्र इसी कार्यशाला के हैं ।

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