मध्यप्रदेश में कौशल विकास योजनाओं में हुआ बड़ा घोटाला, दलाल अंकित कुमार दवे ने MP CON Limited को बिना टेंडर दिलाए करोड़ों के काम

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By Raj RathorePublished On: June 27, 2026
Ankit Ajay Kumar Dave MP CON Limited

MP CON Limited : मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री अनुसूचित जाति अभ्युदय योजना और प्रधानमंत्री दक्षता एवं कुशलता सम्पन्न हितग्राही योजना के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप हैं कि इन योजनाओं के तहत कौशल विकास प्रशिक्षण के नाम पर करोड़ों रुपए के कार्य निर्धारित निविदा प्रक्रिया का पालन किए बिना आवंटित किए जा रहे हैं।

सूत्रों का दावा है कि योजनाओं के संचालन में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने वाले नियमों को दरकिनार कर कुछ चुनिंदा संस्थाओं को लाभ पहुंचाया जा रहा है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए बनाई गई योजनाओं के उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।

केंद्र से आता है करोड़ों का बजट

जानकारी के अनुसार इन दोनों योजनाओं के लिए केंद्र सरकार का सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय राज्य सरकार को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है। यह राशि राज्य के सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के माध्यम से विभिन्न निगमों तक पहुंचती है।

इनमें मध्यप्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम, मध्यप्रदेश पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम, मध्यप्रदेश राज्य सफाई कर्मचारी आयोग तथा मध्यप्रदेश दिव्यांग वित्त एवं विकास निगम सहित अन्य संस्थाएं शामिल हैं। इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से हितग्राहियों को कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।

टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल

सूत्रों का आरोप है कि कौशल विकास प्रशिक्षण से जुड़े कार्यों के लिए एजेंसियों का चयन खुले और प्रतिस्पर्धी टेंडर के माध्यम से किया जाना चाहिए, लेकिन कई मामलों में इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है।

दावा किया जा रहा है कि कुछ सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) को बिना निविदा आमंत्रित किए ही कार्य आवंटित किए जा रहे हैं। जबकि सामान्य परिस्थितियों में किसी भी सरकारी या अर्ध सरकारी संस्था को कार्य देने से पहले निर्धारित खरीद नियमों के तहत निविदा प्रक्रिया अपनाना आवश्यक माना जाता है।

इस दलाल की सबसे ज्यादा चर्चा

मामले में भोपाल में सक्रिय अंकित अजय कुमार दवे का नाम चर्चा में बताया जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि वे विभिन्न निगमों और सार्वजनिक उपक्रमों के बीच समन्वय स्थापित कर कार्य आवंटन में भूमिका निभा रहे हैं।

आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं को यह भरोसा दिलाया जाता है कि बिना टेंडर के भी कार्य आवंटन संभव है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही इस संबंध में संबंधित पक्ष की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है।

एमपीकॉन को लेकर उठे सवाल

सूत्रों के अनुसार एमपीकॉन (MPCON) नामक PSU को कई प्रशिक्षण कार्य बिना टेंडर प्रक्रिया के मिलने की चर्चाएं हैं। बताया जाता है कि संस्था का वार्षिक कारोबार 100 करोड़ रुपए से अधिक है।

मामले से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि किसी PSU को कार्य दिया भी जाना है तो उसके लिए भी निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है। बिना प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के लगातार कार्य आवंटन पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।

गाइडलाइन के पालन पर भी संदेह

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू प्रशिक्षण की गुणवत्ता से जुड़ा है। आरोप हैं कि कई परियोजनाओं में नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क (NSQF) की गाइडलाइन का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशिक्षण कार्यक्रम निर्धारित मानकों के अनुरूप संचालित नहीं किए जाते तो सबसे बड़ा नुकसान उन युवाओं को होता है जिनके लिए ये योजनाएं शुरू की गई हैं। इससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता और रोजगार की संभावनाओं पर भी असर पड़ सकता है।

क्या कहते हैं नियम?

वित्तीय और खरीद प्रक्रियाओं से जुड़े जानकारों का कहना है कि राज्य में भंडार क्रय नियम लागू हैं, जिनके तहत सामान्यतः कार्य आवंटन के लिए टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाती है। केंद्रीय वित्तीय नियम (CFR) भी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया को प्राथमिकता देते हैं।

हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में सार्वजनिक उपक्रमों को बिना टेंडर कार्य देने के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इसके लिए स्पष्ट कारण और वैधानिक आधार आवश्यक होता है। सवाल यह है कि जिन मामलों में बिना टेंडर कार्य दिए गए, क्या वहां ऐसे अपवाद वास्तव में लागू थे?

यदि इन योजनाओं के तहत पिछले कुछ वर्षों में हुए कार्य आवंटनों, भुगतान और प्रशिक्षण रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच कराई जाए तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

नेताओं-अफसरों से करीबी का दावा

सूत्रों का यह भी दावा है कि कथित दलाल अंकित अजय कुमार दवे राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर अपनी पहुंच होने का दावा करता है।

बताया जाता है कि वह नेताओं में मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर तथा अधिकारियों में आर.पी मंडल और आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी शर्मा जी को अपना करीबी बताकर विभिन्न संस्थाओं और अधिकारियों पर प्रभाव बनाने की कोशिश करता है।