देशमध्य प्रदेश

सोनिया का प्रहार

एन के त्रिपाठी

विगत शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष एवं UPA प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों की बैठक आहूत की । इस बैठक में केजरीवाल,मायावती और अखिलेश को छोड़कर सभी विपक्षी नेता उपस्थित हुए। शिव सेना के उद्धव ठाकरे को पहली बार सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली बैठक में भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ। बैठक में कोरोना से उत्पन्न स्थिति तथा इससे उबरने के लिए मोदी सरकार द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के प्रोत्साहन आर्थिक पैकेज पर गहन विचार विमर्श किया गया।

इस बैठक में मंथन के उपरांत इस प्रोत्साहन आर्थिक पैकेज को जनता के साथ एक क्रूर मज़ाक घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही इस बात पर भी दुख व्यक्त किया गया कि भारत सरकार कोरोना के बहाने राज्यों की शक्तियों को अविरल ढंग से छीन भी रही है। आजकल विरोधी दलों की मद्धिम पड़ गई आवाज़ को तेज करने के लिए इस बैठक में भाग ले रहीं 22 पार्टियों ने भविष्य में केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए एक समिति के गठन की घोषणा की।लंबी चर्चा के बाद भारत सरकार को एक 11 सूत्रीय माँग पत्र दिए जाने पर सहमति व्यक्त व्यक्त की गई।

केंद्र सरकार को जो मुख्य सुझाव दिए गए उनमें सर्वाधिक आकर्षक सुझाव भारत के 95 प्रतिशत परिवारों को, अर्थात आयकर दाताओं को छोड़कर,आगामी छह माह तक 7500 रुपये प्रति माह देने का था।इसके अतिरिक्त इतने ही परिवारों को इसी अवधि में 10 किलोग्राम अनाज देने का भी सुझाव दिया गया। इतना ही नहीं, सभी राज्यों को उदारतापूर्वक धन राशि उपलब्ध कराने की भी माँग की गई। वामपंथियों की उपस्थिति को सार्थक करते हुए सभी घोषित नीतिगत सुधारों को निरस्त करने की माँग की गई। इनमें से लेबर लॉ से संबंधित सुधारों का विशेष रूप से विरोध किया गया।

उपरोक्त माँगो को पूरा करने के लिए पैसा कहाँ से प्राप्त होगा, इस पर सभी 22 दलों ने चुप्पी साध ली। बैठक के बाद कांग्रेस के प्रबुद्ध व्याख्याकार अभिषेक मनु सिंघवी ने एक विस्तृत लेख लिखकर धन राशि उपलब्ध कराने के लिए एक बुद्धिमत्तापूर्ण सुझाव दिया। उनका सुझाव था की ये तमाम धनराशि अतिरिक्त नोट छापकर बहुत आसानी से प्राप्त की जा सकती है।उन्होंने श्रीमती सोनिया जी की मीटिंग की कार्रवाई को अपने लेख में सैद्धांतिक जामा पहनाने का प्रयास किया और यह बताया कि इंग्लैंड और जापान ने इसी तर्ज़ पर अपने सभी वेतन कर्मी मज़दूरों के वेतन का बड़ा भाग सरकारी कोष से देना स्वीकृत किया है।

राजनीतिक दलों से किसी आर्थिक विषय पर अर्थशास्त्रियों जैसे तर्क की अपेक्षा करना बेमानी है। आंकड़ों की गहराइयों में जाना और उनके प्रभावों को विश्लेषित करना अधिकांश नेताओं के बूते के बाहर की बात है। इसकी उन्हें आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि बिना किसी जानकारी के उन्हें आर्थिक समस्याओं पर प्रतिक्रिया देने में बहुत सहायता मिलती है।यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि अनेक विपक्षी नेता (इनमें विपक्ष में रहने पर BJP के नेता भी सम्मिलित है ) बजट आने से पहले ही अपनी प्रतिक्रिया लिख कर रख लेते हैं।उन्हें ज़्यादा नहीं लिखना पड़ता है, केवल बजट को निराशाजनक, किसान विरोधी और दिशाहीन आदि बताना पड़ता है। वहीं इसके उलट सरकारी पक्ष बजट को सुनहरे भविष्य का एक मात्र मार्ग बता देता है।

फ़िलहाल प्रोत्साहन आर्थिक पैकेज के संबंध में विरोधी दलों से यही महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है कि यह पैकेज जनता के साथ क्रूर मज़ाक है।