Loan Crisis In India: भारत में माइक्रोफाइनेंस सेक्टर इस समय गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। बीते कुछ वर्षों में भले ही इस क्षेत्र ने तेज़ रफ्तार से विकास किया हो, लेकिन इसके साथ ही गंभीर जोखिम भी सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस सेक्टर में सबप्राइम लोन में 2,100% तक की तेज़ वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि 68% उधार लेने वाले अब कर्ज के दबाव में हैं। हालात ऐसे बन चुके हैं कि लोग पुराने कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेने को मजबूर हैं, जिससे लाखों परिवार ऋण के चक्रव्यूह में फंस गए हैं।
45 अरब डॉलर का यह क्षेत्र, जिसे कभी ग्रामीण और असंगठित समुदायों के लिए आर्थिक राहत का मजबूत जरिया माना जाता था, अब वित्तीय अस्थिरता की वजह बनता नजर आ रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 91 से 180 दिनों के बीच लोन की किस्त नहीं चुकाने वाले उधारकर्ताओं का अनुपात जून 2023 में जहां सिर्फ 0.8% था, वह अब बढ़कर 3.3% तक पहुंच चुका है—जो संभावित डिफॉल्ट की चिंताओं को और गहरा कर रहा है।

इस स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 27% उधारकर्ता पुराने कर्ज चुकाने के लिए नए कर्ज ले रहे हैं। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कुछ परिवारों को बच्चों की पढ़ाई तक बीच में छोड़नी पड़ रही है।
ये कर्ज बिल्कुल वैसे सबप्राइम मॉर्गेज नहीं हैं, जिन्होंने 2007-08 में अमेरिका में वैश्विक वित्तीय संकट को जन्म दिया था। भारत में ये छोटे आकार के, बिना किसी गिरवी के दिए जाने वाले माइक्रो लोन होते हैं, जो असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को दिए जाते हैं — जैसे फुटपाथ पर सब्जी बेचने वाली महिलाएं या घरेलू सिलाई-कढ़ाई का काम करने वाले श्रमिक।
RBI की राहत नीति या उधारी का जाल
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह संकट भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की लचीली नीतियों का नतीजा है? वर्ष 2022 में आरबीआई ने माइक्रोफाइनेंस लोन की परिभाषा में बदलाव किया, जिससे अब वे परिवार जिनकी वार्षिक पारिवारिक आय 3 लाख रुपये तक है, इस लोन के पात्र बन गए। पहले कर्ज पर एक निश्चित सीमा निर्धारित थी, लेकिन नए नियमों के तहत अब परिवार अपनी आय का 50% तक कर्ज ले सकते हैं।
इसके अलावा, ब्याज दरों पर नियंत्रण भी हटा दिया गया और एक परिवार पर दो कंपनियों से ही कर्ज लेने की सीमा भी समाप्त कर दी गई। इस लचीलेपन ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया, जिन्होंने बेहतर रिटर्न और कम जोखिम की उम्मीद में इस क्षेत्र में भारी निवेश किया। हालांकि, हालात उम्मीदों के विपरीत निकले और ज़मीनी हकीकत ने चिंता बढ़ा दी।
माइक्रोफाइनेंस का बूम अब बन रहा है ब्लो-आउट?
असल में, पहले माइक्रोफाइनेंस संस्थान 4 से 6 महिलाओं के समूह को सामूहिक रूप से लोन देते थे, जिसमें सभी की किश्त जमा करने की सामूहिक ज़िम्मेदारी होती थी। इस प्रणाली में सामाजिक दबाव का भी एक अहम रोल था, जिससे समूह का कोई भी सदस्य डिफॉल्ट न कर पाए। लेकिन कोविड महामारी के बाद सामूहिकता की भावना और समूहों की एकजुटता में कमी आई, जिससे यह मॉडल धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।
दिखावे की दौड़ में बढ़ता कर्ज का बोझ
विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड के बाद लोगों ने लोन का उपयोग व्यापार या जीविका सुधारने के बजाय शादियों और लग्जरी चीजों पर खर्च करने में किया। Dvara रिसर्च के कार्यकारी निदेशक इंद्रदीप घोष के अनुसार, हर समाज में स्टेटस दिखाने की प्रवृत्ति होती है, लेकिन जब कर्ज लेना सरल हो जाए और उस पर निगरानी कमजोर हो, तो यह आदत तेजी से खतरनाक रूप ले सकती है।
ग्रामीण भारत में आंकड़ों का अभाव
शहरी इलाकों में डिजिटल पेमेंट के बढ़ते चलन से कर्ज लेने वालों की आर्थिक स्थिति को समझना आसान होता जा रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी नकद लेन-देन का बोलबाला है। इससे किसी परिवार की असली आय और खर्च का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। क्रेडिट ब्यूरो से सीमित जानकारी तो मिलती है, लेकिन फिनटेक प्लेटफॉर्म्स या गोल्ड लोन जैसी गैर-पारंपरिक उधारी का डेटा उपलब्ध नहीं होता। नतीजतन, क्रेडिट जोखिम काफी बढ़ जाता है। पहले जब समूह में महिलाएं मिलकर लोन लेती थीं, तब वे एक-दूसरे की आर्थिक स्थिति से वाकिफ होती थीं और जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से रोक सकती थीं। मगर अब हर कोई अपने जोखिम पर अकेला खड़ा है।