दिल्ली-NCR की हवा हुई जहरीली, नवंबर से पहले ही बढ़ा प्रदूषण; क्या देर से लागू होगा GRAP?

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By EditorPublished On: October 21, 2026

 नई दिल्ली
   अक्टूबर के मध्य में दिल्ली-NCR के आसमान पर एक बार फिर वह परिचित धुंध छा गई है. 20-21 अक्टूबर की सुबह से ही कई इलाकों में सब कुछ धुंधला नजर आने लगा. दिवाली अभी दूर है, पटाखे नहीं फूटे, लेकिन हवा पहले ही भारी हो चुकी है. दशहरा बीत चुका है. रावण के पुतले जलाए जा चुके हैं। 

लोग पूछ रहे हैं- क्या रावण दहन से भी इतना स्मॉग पैदा हो सकता है? नवंबर से ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) लागू होगा, लेकिन उससे लगभग 10-12 दिन पहले ही प्रदूषण अपना असर दिखाने लगा है. इस जल्दी शुरू हुए स्मॉग के पीछे वैज्ञानिक कारण क्या हैं?  

तापमान इनवर्जन और कमजोर हवाएं 

अक्टूबर आते-आते दिल्ली में रातें ठंडी होने लगती हैं. सामान्य दिनों में धरती के पास की गर्म हवा ऊपर उठती है और प्रदूषण वाले तत्वों को बिखेर देती है. लेकिन ठंडी रातों में एक उलटा असर होता है, जिसे तापमान इनवर्जन कहते हैं. इसमें ऊपर गर्म हवा की परत बन जाती है, जो नीचे की ठंडी हवा को ऊपर नहीं जाने देती। 

प्रदूषण वाले तत्व जमीन के पास ही फंस जाते हैं. सुबह के समय यह असर सबसे ज्यादा दिखता है, क्योंकि रात भर जमा हुए प्रदूषण वाले तत्व अभी बिखरे नहीं होते. इसके साथ हवा की गति भी बहुत कम हो जाती है. जब हवा 10 किलोमीटर प्रति घंटे से धीमी चलती है, तो प्रदूषण वाले तत्व दूर नहीं जा पाते।  

दिल्ली का एयर क्वालिटी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम भी बताता है कि कम वेंटिलेशन इंडेक्स और धीमी हवाएं प्रदूषण बढ़ाने वाले कारक हैं. इस साल मॉनसून के बाद बारिश कम हुई और हवाएं शांत रहीं, इसलिए स्थानीय प्रदूषण आसानी से जमा हो गया. इसलिे सुबह का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 200 के पार जाकर ‘खराब’ श्रेणी में पहुंचने लगा। 

स्थानीय स्रोत अब भी बड़े योगदानकर्ता
स्मॉग सिर्फ बाहर से आने वाले धुएं का नतीजा नहीं है. दिल्ली के अपने स्रोत साल भर प्रदूषण फैलाते रहते हैं. वाहनों से निकलने वाला धुआं लगभग 23% योगदान देता है. निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, सड़क की धूल, कचरा जलाना और उद्योगों का उत्सर्जन मिलकर और 15 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाते हैं. सर्वेक्षणों में लोग निर्माण धूल और कचरा जलाने को सबसे बड़ी समस्या बताते हैं. अक्टूबर में ये स्रोत पहले से सक्रिय रहते हैं और मौसम के बदलने के साथ उनका असर बढ़ जाता है। 

पराली जलाना: धीरे-धीरे बढ़ता प्रभाव
पंजाब, हरियाणा और आसपास के राज्यों में धान की कटाई शुरू हो चुकी है. इस साल सितंबर मध्य से अक्टूबर मध्य तक कई सौ पराली जलाने की घटनाएं दर्ज हुई हैं. पंजाब में पिछले साल की तुलना में कुछ जिलों में आंकड़े बढ़े हैं. अभी तक दिल्ली के पीएम 2.5 में पराली का योगदान 4 प्रतिशत के आसपास रहा, लेकिन अगले कुछ दिनों में यह 8-13% तक पहुंच सकता है. उत्तर-पश्चिमी हवाएं इस धुएं को दिल्ली की ओर ला सकती हैं. हालांकि शुरुआती दिनों में यह मुख्य कारण नहीं है, लेकिन मौसम अनुकूल होने पर इसका हिस्सा तेजी से बढ़ जाता है। 

रावण के पुतले जलाने का कितना असर?
दशहरा पर रावण, कुंभकरण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं. इनमें बांस, कपड़ा, प्लास्टिक जैसी सामग्री और आतिशबाजी होती है. जलने पर ये पीएम 2.5, पीएम 10, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक कण छोड़ते हैं। 

स्थानीय स्तर पर, खासकर जहां कई पुतले एक साथ जलते हैं, वहां अस्थायी रूप से प्रदूषण का स्तर बढ़ सकता है. विशेषज्ञ इसे ‘हाइपरलोकल इमिशन’ कहते हैं. लेकिन पूरे शहर के स्मॉग के लिए यह मुख्य कारण नहीं बनता. दशहरा के अगले दिन का धुंधलापन ज्यादातर तापमान इनवर्जन, कमजोर हवाओं और पहले से जमा प्रदूषण का परिणाम है. रावण दहन सिर्फ एक छोटा अतिरिक्त बोझ डालता है। 
ग्रैप नवंबर से क्यों?
ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान नवंबर से शुरू होता है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण का चरम नवंबर-दिसंबर में आता है, जब पराली जलाना चरम पर होता है. सर्दी पूरी तरह बैठ जाती है. लेकिन मौसम विज्ञान के अनुसार अक्टूबर के अंत में ही परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाती हैं। 

इसलिए इस साल प्रदूषण 10-12 दिन पहले सक्रिय हो गया. दिल्ली सरकार ने नवंबर से 10 प्वाइंट वाला शीलकालीन प्रोजेक्ट घोषित किया है, जिसमें पुराने वाहनों पर रोक, पीयूसी चेक, निर्माण पर नियंत्रण और वर्क फ्रॉम होम जैसे कदम शामिल हैं। 

दिल्ली-NCR की समस्या का मूल वैज्ञानिक कारण है- स्थानीय और क्षेत्रीय उत्सर्जन लगातार होते रहते हैं, लेकिन अक्टूबर से मौसम उन्हें फंसाने लगता है. हिमालय की वजह से इंडो-गैंगेटिक मैदान एक कटोरे की तरह काम करता है, जहां प्रदूषण वाले तत्व आसानी से बाहर नहीं निकल पाते। 

मिक्सिंग हाइट यानी प्रदूषण वाले तत्वों के फैलने की ऊंचाई कम हो जाती है. रात में तापमान गिरने से कण और भी गाढ़े हो जाते हैं. यही वजह है कि दीवाली से पहले ही सुबह की धुंध दिखने लगती है. रावण दहन अकेला दोषी नहीं है. असली कारण मौसम के बदलते पैटर्न और लगातार चलने वाले स्थानीय-क्षेत्रीय उत्सर्जन का मिश्रण है। 

आने वाले हफ्तों में अगर हवाएं नहीं चलीं और पराली जलाना बढ़ा तो स्थिति और बिगड़ सकती है. इसलिए व्यक्तिगत स्तर पर मास्क पहनना, अनावश्यक बाहर न निकलना और सामूहिक स्तर पर उत्सर्जन कम करने के प्रयास जरूरी हैं. साफ हवा के लिए सिर्फ सरकारी योजनाएं काफी नहीं, जागरूकता और सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।