एक्ज़िट पोल से ज्यादा अनुमान तो फुटपाथ पर बैठा तोता बता देगा | Exit Poll contains Data Manipulation | Lok Sabha Chunav 2019

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नीरज राठौर

एक्जिट पोल एक बकवास है। इसमें डाटा का मेनिपुलेशन होता है। मुझे इसकी वैज्ञानिकता संदिग्ध लगती है। इस धंधे की नस-नस जानता हूं मैं। बल्कि इस धंधे में शामिल भी रहा हूं।
मेरा मानना है कि इनके सफल होने के चांस 50% हैं। इतना तो फुटपाथ का हीरामन तोता भी बता देता है या तो ये जीतेगा या वो जीतेगा।

एक्ज़िट पोल का सक्सेस रेट लगभग 50% होता है। जितना आपके पान वाले का या मेरे सब्ज़ी वाले का है। यानी ये एक्ज़िट पोल सही भी हो सकते हैं. वैसे होने को ग़लत भी हो सकते हैं। इसलिए कोई चैनल एक्ज़िट पोल नहीं करता। उसे गुमनाम कंपनियों से कराया जाता है। रिज़ल्ट सही तो चैनल का। ग़लत तो कंपनी का।

ग़लत भी हुआ तो कौन याद रखता है। 2004 में सारे ग़लत थे, किसे याद है, बिहार में ग़लत था, सब भूल गए। छत्तीसगढ़ ग़लत था। ऐसा ही होता है। लेकिन एक्ज़िट पोल का महत्व है.
जब एक्ज़िट पोल किसी पार्टी को जीतता बताते हैं तो चार बातें होती हैं-

  1. काउंटिंग में लगे अफ़सर उस पार्टी के लिए नरम हो जाते हैं।
  2. हारती दिखाई गई पार्टी का पहरा मशीनों को लेकर ढीला हो जाता है. काउंटिंग में भी वो पस्त रहते हैं।
  3. कॉरपोरेट जगत हारती दिखाई गई पार्टियों पर दाँव नहीं लगाता। इससे जोड़तोड़ और ख़रीद फ़रोख़्त में जीतती दिखाई गई पार्टी भारी हो जाती है।
  4. हारती दिखाई गई पार्टियों में आपसी बातचीत का जोश कम हो जाता है।

भारत में एग्जिट पोल का इतिहास भी देख लो-

1996 के लोकसभा चुनाव के समय भारत में पहला एक्जिट पोल हुआ। इसे दूरदर्शन पर दिखाया गया। एंकर टीवी टुडे ने दिए। दूरदर्शन ने ये एक्जिट पोल सीएसडीएस से करवाया। अगला एक्जिट पोल 1998 में हुआ, जिसे चार कंपनियों ने किया। ये वही समय था, जब प्राइवेट न्यूज चैनल आ रहे थे।
चुनाव और नतीजों के बीच एक इवेंट के तौर पर एक्जिट पोल को क्रिएट किया गया। इसके लिए विज्ञापन जुटाए गए।

विज्ञापन मिला भी क्योंकि लोगों में ये उत्सुकता तो होती ही है कि क्या रिजल्ट रहेगा। इसका फायदा टीवी न्यूज ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री और विज्ञापन जगत ने उठाया। इसमें कोई अपराध नहीं है। उन्हें एक मौका मिला. एक प्रॉपर्टी बनाई और बेच डाला। जब सिर्फ अखबार थे, तब एक्जिट पोल नहीं था।

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