जयंती विशेष: डॉ. आंबेडकर की विचारधारा अपनाने में राष्ट्र का कल्याण है | Jubilee special: The Welfare of the Nation in adopting Dr. Ambedkar’s Ideology

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Dr BD Ambedkar

नीरज राठौर की कलम से

किसी चौराहे या पार्क में नीले रंग की एक मूर्ति, जिसके हाथ में संविधान की एक किताब दबी हुई है, इस किताब के ऊपर मोटे-मोटे अक्षरों में संविधान खुदा हुआ है और दूसरे हाथ की एक उंगली आसमान की तरफ इशारा करती है। इस उंगली का इशारा क्या है? बाबा साहब की इस उंगली का मतलब कुछ भी हो लेकिन ऊपर की ओर उठी आसमान की तरफ इशारा करती उंगली आज खतरे में है, कहीं उंगली तोड़ी जा रही है, कहीं उंगली समेत पूरी मूर्ति। आखिर क्यों? जवाब बहुत आसान है कि कुछ लोग उन्हें पसंद नहीं करते। पसंद न करने का कारण क्या है? क्योंकि वे उनकी विचारधारा के नहीं हैं। अम्बेडकर की भी कोई विचारधारा है या थी? सिवाय इसके कि वे सबको एकसमान मानते थे, महिला-पुरुष, जाति, धर्म जैसी कोई चीजें उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थीं, यही उनकी विचारधारा है।

अम्बेडकर उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो मानवता में विश्वास करती है, जिसका मूलमंत्र ही सबकी समानता है। भारत के सदियों के इतिहास में ये समानता सबको हासिल नहीं थी, हर कोई एक दूसरे से दूर था। इस दूरी में कहीं जाति बाधक थी तो कहीं धर्म, महिलाएं पुरुषों से पीछे थीं। उनको घर की चहारदीवारी में कैद कर दिया गया था।

अम्बेडकर ने अर्थशास्त्र की दृष्टि से समझा कि सबकी भागीदारी और सबकी समानता बहुत जरूरी है। भारत जैसे बनते राष्ट्र के लिए हर व्यक्ति की सहभागिता आवश्यक है बिना किसी बंधन के। भारतीय का संविधान, भारतीय परिदृश्य में लिखी गई अब तक की सबसे बेहतरीन किताब है। संविधान एक किताब में लिखे महज कुछ शब्द नहीं हैं। संविधान की किताब में सदियों का इतिहास, चल रहा वर्तमान और आने वाला भविष्य संकलित है। इस किताब को खोलने पर पहले पन्ने पर लिखी भूमिका के शुरुआती शब्द “हम भारत के लोग” एक आदर्श वाक्य है, जिसको हमेशा याद रखा जाना आवश्यक है।

जब संविधान में ‘हम भारत के लोग’ एक शब्द के रूप में जोड़ा जा रहा था, तब उम्मीद की गई थी कि धर्म, जाति, लिंग से ऊपर उठकर हम पहले भारतीय होंगे। इससे पहले हम सबकुछ थे लेकिन नागरिक नहीं थे। केवल वोट और टैक्स देकर नागरिक बन जाना नहीं होता। नागरिकों के कुछ कर्तव्य होते हैं, कुछ अधिकार होते हैं, जो समान रूप से सभी के पास एक समान हैं, न किसी को कम और न किसी को ज्यादा। ये अधिकार कहने को तो सभी को दिए गए हैं लेकिन क्या वास्तविकता में ऐसा है?

संविधान सभा में एक सवाल पूछा गया कि सबकुछ संविधान में लिखने का क्या मतलब है और दूसरा सवाल था कि क्या संविधान देश की जरूरतों और उसकी आकांक्षाओं को पूरा कर सकेगा? जवाब देते हुए डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा था कि देश में अभी भी महिलाएं, दलित, मुसलमान तमाम ऐसे वर्ग हैं जिनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए जरूरी है कि उनके लिए एक स्थाई व्यस्था जरूरी है।

व्यक्ति को अधिकारों से परिचित कराने वाले भीमराव अम्बेडकर आज खुद अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। वे प्रतीकों की राजनीति का शिकार हैं, हर दल उन्हें अपना बनाने की कोशिश कर रहा है लेकिन संवैधानिक मूल्यों को ताक पर रखकर।

आप हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को वे समाप्त करना चाहते थे इसीलिए उनके विचारों में हिन्दू धर्म एवं इसमें व्याप्त असमानता के विरुद्ध कटुता और आक्रामकता दिखती है, लेकिन इसका यह अभिप्राय कतई नहीं है कि उन्हें भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत का अभिमान नहीं होता। उन्होंने अपने कष्ट का उल्लेख करते हुए ‘बहिष्कृत भारत’ पत्रिका में ‘हिन्दुओं का धर्मशास्त्र’ शीर्षक से संपादकीय लिखा, ”अति प्राचीन काल के वैभव संपन्न राष्ट्रों में हिंदू राष्ट्र भी एक है। मिस्र, रोम, ग्रीस आदि का अस्तित्व समाप्त हो गया परंतु हिन्दू राष्ट्र आज तक जीवित है, इसलिए बलवान है यह कहना भी अपने को धोखे में रखने की बात है। हिंदू राष्ट्र की पराजय तथा उसके पतन के कारणों में उसका भेदभाव मूलक धर्मशास्त्र भी है। यह हमें मानना पड़ेगा।

डॉ. आंबेडकर एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज का स्वप्न देखते थे, जिसमें महत्ता और सामाजिक स्तर के मामले में सभी व्यक्तियों के साथ समान रूप से व्यवहार किया जाए। वह सामाजिक असमानता और शोषण के कारकों को पूरी तरह से खारिज करते थे। वह मानते थे कि एक व्यवस्था के भीतर समतावादी न्याय सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को कायम करने की जरूरत होती है। चूंकि जाति व्यवस्था इन तीन बुनियादी तत्वों का उल्लंघन करती है, जिसके चलते यह भारतीय समाज में न्याय के विचार को जड़ जमाने में मुख्य अवरोध है।

आंबेडकर के लिए कानून एक ऐसी चीज है, जो सबसे वंचित लोगों के अधिकारों की गारंटी देता है। आंबेडकर ने जिस हिंदू कोड बिल को संसद में पेश किया था, वह भेदभाव वाले कानूनों, हिंदू पारिवारिक संहिता को खारिज करता है। यह बिल पुत्र और पुत्री दोनों को उनके पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार प्रदान करता है। इस बिल ने एकल विवाह प्रथा और तलाक के मामले में महिलाओं के पक्ष में क्रन्तिकारी प्रावधान किए। आंबेडकर ने धर्म को ‘सर्वधर्म समभाव’ के रूप में देखा और माना। उनका स्पष्ट मत था कि नियमबद्ध धर्म के स्थान पर ‘सिद्धान्तों’ का धर्म होना चाहिए। आगे आंबेडकर ने धर्म को चार सिद्धान्तों में प्रतिपादित किया। धर्म नैतिकता की दृष्टि से प्रत्येक धर्म का मान्य सिद्धांत है, …..धर्म बौद्धिकता पर टिका होना चाहिए, जिसे दूसरे शब्दों में विज्ञान कहा जा सकता है।’

इसके नैतिक नियमों में स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व भाव का समावेश हो, जब तक सामाजिक स्तर पर धर्म में ये तीन गुण विद्यमान नहीं होगें, धर्म का विनाश हो जाएगा, धर्म को, दरिद्रता को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। इसलिए डॉ॰ आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को पसन्द किया कि वह समानता पर आधारित धर्म है। अन्ततः सीमित शब्दों में आंबेडकर के धर्म के दृष्टिकोण के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि नियमबद्ध धर्म के स्थान पर सिद्धांतों का धर्म होना चाहिए।

युगदृष्टा एवं वंचितों के इस मसीहा ने देश में नासूर बन चुकी छूत-अछूत, जाति-पाति, ऊंच-नीच आदि कुरीतियों के उन्मूलन के लिए अंतिम सांस तक अनूठा और अनुकरणीय संघर्ष किया। उन्होंने 6 दिसम्बर, 1956 को अपने अनंत संघर्ष की बागडोर नए युग के कर्णधारों के हाथों सौंप, महापरिनिर्वाण को प्राप्त हो गए। वंचितों के महान मुक्तिदाता और भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का निधन हुए हालांकि 63 वर्ष हो चुके हैं, फिर भी भारतीय समाज पर उनके विचारों का गहरा प्रभाव कायम है। समाज में व्याप्त कुरीतियों को त्यागना व उनकी शिक्षाओं की अलख देशभर में जगाना ही बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

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