इंदौर में एक शब्द पड़ा 22 जिंदगियों पर भारी, लोग पीते रहे गंदा पानी, अधिकारी करते रहे “Discuss”

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By Raj RathorePublished On: September 30, 2026
Indore Bhagirathpura Contaminated Water

इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी की वजह से हुई मौतों के मामले में जांच रिपोर्ट से प्रशासनिक स्तर पर हुई लापरवाही के कई पहलू सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नई पाइपलाइन बिछाने के 2.40 करोड़ रुपए के प्रस्ताव की फाइल पर सिर्फ ‘Discuss’ लिखे जाने के बाद 72 दिनों तक आगे की कार्रवाई नहीं हुई। इस देरी के कारण पाइपलाइन का काम समय पर शुरू नहीं हो सका।

रिपोर्ट में पानी के सैंपल को लेकर भी गंभीर स्थिति सामने आई है। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में भागीरथपुरा के 52 बोरवेल में से 50 के पानी में टोटल कॉलिफॉर्म पाए गए, जबकि 40 सैंपल में ई-कोलाई की मौजूदगी मिली।

कई जगह सीवर और पेयजल पाइपलाइन आपस में मिली

जांच में सामने आया कि भागीरथपुरा में पेयजल और सीवर की पाइपलाइन व्यवस्था काफी पुरानी और कई जगह क्षतिग्रस्त थी। कुछ स्थानों पर दोनों पाइपलाइनें एक-दूसरे के संपर्क में थीं। लीकेज के कारण सीवर का पानी पेयजल लाइन में मिल गया और दूषित पानी घरों तक पहुंचा।

पानी की गुणवत्ता को लेकर अलग-अलग जांच में भी गंभीर स्थिति सामने आई। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में 52 में से 50 सैंपल में टोटल कॉलिफॉर्म और 40 में ई-कोलाई मिला।

‘Discuss’ के बाद 72 दिन तक अटकी रही फाइल

रिपोर्ट के मुताबिक, घटना से पहले इलाके में करीब 2.40 करोड़ रुपए की नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। 15 अक्टूबर 2025 को एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया ने फाइल पर ‘Discuss’ लिखकर आगे चर्चा के लिए भेजा।

इसके बाद इस फाइल पर अगली चर्चा 18 दिसंबर को हुई। 26 दिसंबर को फाइल दोबारा आगे बढ़ी। इस तरह प्रस्ताव पर कार्रवाई में करीब 72 दिन का समय लग गया। इसके बाद 29 दिसंबर को टेंडर खोला गया और 13 जनवरी 2026 को पाइपलाइन का काम शुरू हो सका।

पुराना पाइपलाइन प्रोजेक्ट भी करीब 20 महीने लेट

जांच रिपोर्ट में एक पुराने पाइपलाइन प्रोजेक्ट में देरी का भी उल्लेख है। करीब 2.25 करोड़ रुपए का यह काम 14 मई 2024 तक पूरा होना था, लेकिन इसे जनवरी 2026 में पूरा किया गया।

रिपोर्ट में इस देरी के लिए ठेकेदार मालवा इंजीनियरिंग और सुपरविजन से जुड़े इंजीनियरों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। करीब 97 लाख रुपए का एक अन्य टेंडर भी बार-बार निरस्त होता रहा और दोबारा प्रक्रिया शुरू की गई, जिससे काम में और देरी हुई।

AE ने कहा- ‘पता नहीं था यह मेरी ड्यूटी है’

जांच के दौरान क्षेत्र में तैनात रहे सहायक यंत्री (AE) सरोज कुमार प्रजापति के बयान का भी रिपोर्ट में उल्लेख है। उनके मुताबिक, उन्हें इलाके के लोगों से क्षतिग्रस्त पाइपलाइन, बदबू और काले पानी की शिकायतें मिल रही थीं।

जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने इसकी जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को क्यों नहीं दी, तो उन्होंने बताया कि उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि इसकी सूचना देना उनकी जिम्मेदारी है या ड्रेनेज विभाग की। रिपोर्ट में इस रवैये को गंभीर लापरवाही माना गया है। वरिष्ठ जल प्रदाय यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव की भूमिका को लेकर भी रिपोर्ट में जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आई है।

पुराने नक्शे और रिकॉर्ड भी नहीं मिले

जांच समिति ने 1990-95 और 1999-2004 के बीच बिछाई गई पानी और सीवर पाइपलाइन से जुड़े रिकॉर्ड भी तलाशे। लेकिन नगर निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) के पास उस दौर के कई नक्शे, ब्लूप्रिंट और फाइलें उपलब्ध नहीं मिलीं।

IDA की ओर से पुराने रिकॉर्ड 2010 में नष्ट किए जाने की बात कही गई, लेकिन इसके समर्थन में दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके। रिपोर्ट में इन रिकॉर्ड के गायब होने की अलग से जांच की बात कही गई है।

कमिश्नर और मेयर की व्यक्तिगत लापरवाही नहीं

जांच रिपोर्ट में तत्कालीन नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव को टेंडर प्रक्रिया में देरी या दूषित पानी की घटना के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं माना गया है। रिपोर्ट में उनके स्तर पर सीधे तौर पर लापरवाही सामने नहीं आने की बात कही गई है।

वहीं, मेयर पुष्यमित्र भार्गव के पास एक पुराने प्रस्ताव की फाइल 66 दिन लंबित रहने के मामले में भी रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि फाइल लगातार सीधे उन्हीं के पास लंबित थी। इसलिए उनके खिलाफ भी व्यक्तिगत लापरवाही साबित नहीं हुई।