अशोकनगर के करीला धाम मेले में आज पहुंचेंगे सीएम डॉ. मोहन यादव, कई विकास परियोजनाओं का करेंगे शुभारंभ

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By Pinal PatidarPublished On: March 9, 2026

मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले की बहादुरपुर तहसील स्थित ग्राम पंचायत जसैया के अंतर्गत आने वाले ग्राम करीला में हर वर्ष रंगपंचमी के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला पूरे क्षेत्र में धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है। इस वर्ष यह विशाल मेला 7 मार्च से 9 मार्च 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। मेले में लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, चिकित्सा सेवाएं, पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। अनुमान है कि तीन दिनों के इस आयोजन में करीब 20 लाख श्रद्धालु करीला धाम पहुंचकर माँ जानकी के दर्शन करेंगे और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेंगे।

मुख्यमंत्री मोहन यादव भी होंगे शामिल

रंगपंचमी के इस ऐतिहासिक मेले में 8 मार्च 2026 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी शामिल होंगे। मुख्यमंत्री यहाँ पहुँचकर माँ जानकी के मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। इसके साथ ही वे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर स्व-सहायता समूहों द्वारा लगाई गई विशेष प्रदर्शनी का अवलोकन करेंगे, जिसमें ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए गए उत्पाद और स्वरोजगार से जुड़े कार्य प्रदर्शित किए जाएंगे। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री जिले में विभिन्न विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी करेंगे, जिससे क्षेत्र के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

करीला धाम: आस्था और इतिहास से जुड़ा पवित्र स्थल

करीला धाम धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं से जुड़ा एक अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है। मान्यता है कि माता जानकी ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश के साथ इस क्षेत्र के घने जंगलों में निवास किया था, जिसके कारण इस स्थान का नाम करीला पड़ा। यहाँ स्थित मुख्य मंदिर में माता जानकी के साथ महर्षि वाल्मीकि और उनके पुत्र लव-कुश की प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र हैं। खास बात यह है कि रंगपंचमी के अवसर पर वाल्मीकि गुफा के कपाट विशेष रूप से खोले जाते हैं, जिनके दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

रंगपंचमी पर लाखों भक्त करते हैं माँ जानकी के दर्शन

रंगपंचमी के दिन सुबह से ही करीला धाम में श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। दिन भर और रात भर भक्तों की भीड़ मंदिर परिसर में उमड़ती रहती है। लाखों श्रद्धालु माँ जानकी के दरबार में माथा टेककर अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। श्रद्धालु मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद प्रसाद चढ़ाते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। कई भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर मंदिर परिसर के बाहर पारंपरिक राई नृत्य का आयोजन भी करवाते हैं, जो इस मेले की विशेष पहचान माना जाता है।

माँ जानकी की भभूति को माना जाता है चमत्कारी

करीला धाम से जुड़ी एक विशेष परंपरा भभूति से भी जुड़ी हुई है। मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालु यहाँ से भभूति लेकर अपने घर और खेतों में ले जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह मान्यता प्रचलित है कि इस भभूति को खेतों में फसलों पर छिड़कने से फसलों में लगने वाले कीट और बीमारियां दूर हो जाती हैं। खासकर जब फसल में इल्ली या अन्य कीट लग जाते हैं, तो किसान माँ जानकी के दरबार की भभूति खेतों में डालते हैं। लोगों का विश्वास है कि माँ की कृपा से फसल सुरक्षित रहती है और अच्छी पैदावार होती है।

राई नृत्य की अनोखी परंपरा और सांस्कृतिक महत्व

करीला धाम के मेले में राई नृत्य का विशेष महत्व है। स्थानीय मान्यता के अनुसार जिन दंपतियों की संतान नहीं होती, वे यहाँ आकर माँ जानकी से मन्नत मांगते हैं। जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है तो वे आभार स्वरूप यहाँ राई नृत्य का आयोजन करवाते हैं। लोककथाओं के अनुसार जब लव और कुश का जन्म हुआ था, तब माता जानकी के आग्रह पर महर्षि वाल्मीकि ने भव्य जन्मोत्सव मनाया था। उस अवसर पर स्वर्ग से अप्सराएं उतरकर आई थीं और उन्होंने आनंदपूर्वक नृत्य प्रस्तुत किया था। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज भी रंगपंचमी के अवसर पर यह उत्सव मनाया जाता है।

रातभर गूंजते हैं नगाड़े और मृदंग, भोर में होता है समापन

रंगपंचमी की रात करीला धाम में लोक संस्कृति का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। सैकड़ों नृत्यांगनाएँ पारंपरिक परिधानों में सजकर राई नृत्य प्रस्तुत करती हैं। वे सिर पर ओढ़नी का घूंघट डाले, पैरों में घुंघरू पहनकर नगाड़ों की गूंज और मृदंग की थाप पर पूरे उत्साह के साथ नृत्य करती हैं। लंबे घेर वाले रंग-बिरंगे लहंगों और घुंघरुओं की खनखनाहट के बीच यह नृत्य पूरी रात चलता है। सुबह होने पर नृत्यांगनाओं द्वारा विशेष ‘बधाई नृत्य’ प्रस्तुत किया जाता है, जिसके साथ ही इस भव्य मेले का समापन होता है।