Holi 2026: इंदौर के राजवाड़ा पर 300 साल पुरानी होलिका दहन परंपरा कायम, अब प्रशासनिक संरक्षण में शाही विरासत

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By Pinal PatidarPublished On: March 2, 2026

राजवाड़ा लगभग 300 वर्षों से होलिका दहन की ऐतिहासिक परंपरा का साक्षी बना हुआ है। हर वर्ष की तरह इस बार भी 2 मार्च की संध्या को यहां होलकर राजवंश की रीति-नीति के अनुसार होलिका दहन किया जाएगा। भले ही अब राजशाही व्यवस्था समाप्त हो चुकी हो और रियासत इतिहास का हिस्सा बन गई हो, लेकिन यह परंपरा आज भी प्रशासनिक संरक्षण में निरंतर जारी है। राजवाड़ा पर आयोजित होली की सभी व्यवस्थाएं शासन द्वारा की जाती हैं, इसलिए इसे ‘सरकारी होली’ के नाम से भी जाना जाता है। परंपरा के मुताबिक प्रथम पूजन होलकर परिवार के सदस्य उदय सिंह राव होलकर करेंगे, जिसके बाद आम श्रद्धालु पूजा-अर्चना में भाग लेंगे।

मल्हारराव के काल से आरंभ हुई गौरवशाली शुरुआत

इंदौर के राजसी इतिहास में होलिका दहन की यह परंपरा विशेष महत्व रखती है। माना जाता है कि मल्हारराव होलकर के शासनकाल (1728-1766) में राजवाड़ा के मुख्य द्वार के सामने गोधूलि वेला में होलिका दहन की शुरुआत हुई थी। उस दौर में यह आयोजन राजसी गरिमा और अनुशासन के साथ संपन्न होता था। देशभर के राजमहलों और रियासतों में होली उत्सव की परंपरा रही है, लेकिन इंदौर का राजवाड़ा अपने ऐतिहासिक निरंतरता के कारण विशेष पहचान रखता है।

करीब तीन सौ वर्षों का ऐतिहासिक सिलसिला

इतिहासकारों के अनुसार राजवाड़ा के सामने होलिका दहन की परंपरा लगभग 290 से 300 वर्ष पुरानी है। कुछ विद्वान इसे 298 वर्ष प्राचीन मानते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रघुवीर सिंह का मत है कि जब गौतमा बाई साहिब इंदौर आईं और राजवाड़ा के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, तभी से इस परंपरा की नींव पड़ी होगी। इस प्रकार यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि इंदौर के स्थापत्य और सामाजिक इतिहास से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

पंद्रह दिन तक चलता था शाही होली महोत्सव

राजशाही काल में होली का उत्सव केवल एक दिन का आयोजन नहीं था, बल्कि पूरे पंद्रह दिनों तक चलने वाला भव्य समारोह होता था। राजवाड़े के भीतर आकर्षक और रंगीन मंडप सजाए जाते थे। संगीत, नृत्य और पारंपरिक खेल ‘आट्या-पाट्या’ जैसे आयोजन होते थे। होलकर नरेश, दरबारी और सरदार बैंड-बाजों के साथ जुलूस निकालते हुए राजवाड़े के समीप स्थित ‘मुदबक’ से पवित्र अग्नि लाते थे, और उसी अग्नि से होलिका दहन संपन्न होता था। होली के दूसरे दिन ‘वीर निकालने’ की परंपरा भी थी, जो स्वतंत्रता के बाद समाप्त हो गई।

राजकीय अवकाश और ऐतिहासिक दस्तावेजों में उल्लेख

1925 की होलकर राज्य प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार होलिकोत्सव पर होने वाला समस्त खर्च राजकोष से वहन किया जाता था। उस समय होली पर दो दिन का राजकीय अवकाश घोषित रहता था। 1907 में प्रकाशित इंदौर जिला गजेटियर में कैप्टन सी. ई. लुआर्ड ने इस पर्व की भव्यता का उल्लेख किया है। वहीं 1931 के इंदौर स्टेट गजेटियर में एल.सी. धारीवाल ने लिखा है कि यह उत्सव सभी धर्मों के लोगों द्वारा मिल-जुलकर मनाया जाता था और इसे सामाजिक सद्भाव तथा भाईचारे का प्रतीक माना जाता था।

गौ-काष्ठ से प्रज्वलित होगी परंपरागत होलिका

राजवाड़ा के सामने प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी गोधूलि वेला में गौ-काष्ठ (कंडों) से निर्मित होलिका का दहन किया जाएगा। यह आयोजन राजपरिवार के राजपुरोहित द्वारा परंपरागत विधि-विधान से संपन्न कराया जाता है। होलकर राजपरिवार की ओर से प्रतिनिधि इस पूजन में सम्मिलित होते हैं, जिससे सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित बनी हुई है।

इंदौर की शान: ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी राजवाड़ा

1728 में मल्हारराव होलकर को पुणे के पेशवा से इंदौर और आसपास के 12 महाल जागीर स्वरूप प्राप्त हुए थे। 1734 में उनकी पत्नी गौतमा बाई को खासगी जागीर में इंदौर सहित मालवा और खानदेश के गांवों की सनद मिली। इसके बाद इंदौर को स्थायी निवास बनाकर यहां भव्य राजप्रासाद निर्माण का निर्णय लिया गया। माना जाता है कि 1734 से 1744 के बीच राजवाड़ा का निर्माण आरंभ हुआ। 1818 के बाद इसके निर्माण कार्य में और गति आई। समय के उतार-चढ़ाव के बावजूद राजवाड़ा आज भी इंदौर की आन-बान-शान के रूप में खड़ा है और हर वर्ष होलिका दहन की परंपरा के माध्यम से अपने गौरवशाली इतिहास को जीवंत करता है।